Indian Penal Code, 1860
धारा 62
repealedForfeiture of property, in respect of offenders punishable with death, transportation or imprisonment.
Repealed by S. 4 ibid.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
धारा 62 के तहत मूलतः अदालतें गंभीर अपराधों (जिनके लिए मृत्युदंड, देशनिकाला/देशांतरण या कारावास का प्रावधान था) में अतिरिक्त दंड के रूप में दोषी की संपत्ति जब्त करने का आदेश दे सकती थीं। यह विचार पुराने ब्रिटिश दंड कानून की परंपराओं से आया था, जहाँ संपत्ति की ज़ब्ती एक सामान्य दंड उपकरण थी। जैसे-जैसे भारतीय आपराधिक कानून विकसित हुआ, विधायकों ने माना कि सामान्य दंड के रूप में संपत्ति की जब्ती कठोर, पुरानी पड़ चुकी और आधुनिक आपराधिक न्याय के सिद्धांतों से असंगत है; इसलिए इसे एक संशोधन के जरिए (निरसन अधिनियम की धारा 4 द्वारा) निरस्त कर दिया गया।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: आज भी धारा 62 IPC के जरिए दोषी की संपत्ति जब्त की जा सकती है।
तथ्य: धारा 62 बहुत पहले निरस्त हो चुकी है और इसका कोई विधिक प्रभाव नहीं है; अदालतें किसी भी उद्देश्य से इस पर भरोसा नहीं कर सकतीं।