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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 55

repealed

Commutation of sentence of imprisonment for life

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

औपनिवेशिक काल के संहिताकारों ने कठोर या अनिश्चित दंडों को न्यायालय में वापस गए बिना ही कार्यपालिका द्वारा परिस्थितियों के अनुसार समायोजित करने हेतु आईपीसी में दंड-परिवर्तन की शक्तियाँ जोड़ीं — जैसे अच्छे आचरण, परिस्थितियों में बदलाव, या कारागार सुधार/क्षमा जैसी नीतिगत वजहों के मामलों में। धारा 55 मृत्युदंड के लिए समान प्रावधान (धारा 54) के साथ स्थित है और सरकार को आजीवन कारावास को एक निश्चित अवधि में बदलने की लचीलापन देती है, जो संविधान के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल की क्षमादान शक्तियों से भिन्न है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने बार‑बार स्पष्ट किया है कि आईपीसी के तहत ‘आजीवन कारावास’ का अर्थ दोषी के प्राकृतिक जीवन के शेष भाग तक कारावास है, 14 या 20 वर्ष की निश्चित अवधि नहीं — वह संख्या केवल परिहार/रिमिशन पर विचार करने का एक चरण दर्शाती है, रिहाई का अधिकार नहीं (जैसा कि Gopal Vinayak Godse v. State of Maharashtra में समझाया गया)। सर्वोच्च न्यायालय ने, विशेषतः Union of India v. V. Sriharan में, धारा 55 के तहत कार्यपालिका की दंड-परिवर्तन शक्ति (आजीवन कारावास को निश्चित अवधि में बदलना) को दंप्रसं (CrPC) की धारा 433A के अधिक सीमित रिमिशन प्रक्रिया तथा संविधान के अनुच्छेद 72 और 161 के अंतर्गत क्षमाशक्ति से अलग ठहराया है, यह कहते हुए कि ये भिन्न प्रक्रियाओं से संचालित होती हैं और इनका मिश्रण नहीं किया जा सकता।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: भारत में ‘आजीवन कारावास’ अपने‑आप केवल 14 वर्ष की कैद का अर्थ होता है।

    तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि आजीवन कारावास का क़ानूनी अर्थ व्यक्ति के प्राकृतिक जीवन के शेष भाग तक कारावास है; 14 वर्ष केवल रिमिशन या दंड-परिवर्तन पर विचार का एक सामान्य संदर्भ बिंदु है, कोई निश्चित रिहाई‑तिथि नहीं।

  • मिथक: धारा 55 कैदियों को छोटी सजा मांगने का अधिकार देती है।

    तथ्य: धारा 55 के तहत दंड-परिवर्तन की शक्ति सरकार के पास है, कैदी के पास नहीं — इसे कैदी की सहमति के बिना भी प्रयोग किया जा सकता है, पर कैदी के पास इसे जबरन लागू कराने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।