Indian Penal Code, 1860
धारा 53
repealedPunishments
The punishments to which offenders are liable under the provisions of this Code are
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
थॉमस बैबिंगटन मैकाले के मार्गदर्शन में 1830–1860 के दशक में तैयार की गई भारतीय दंड संहिता का उद्देश्य समूचे ब्रिटिश भारत के लिए एक समान आपराधिक कानून बनाना था, ताकि बिखरी हुई और असंगत स्थानीय दंड-प्रथाओं का स्थान ले सके। धारा 53 इसीलिए लिखी गई थी कि न्यायालयों के लिए उपलब्ध दंडों के प्रकार एक ही स्थान पर स्पष्ट रूप से निर्धारित हो जाएँ, ताकि देश भर के न्यायाधीश मनमाने या क्षेत्र-विशेष के दंडों के बजाय एकसमान और पूर्वानुमेय दंड-सीमा लागू करें।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
न्यायालयों ने सामान्यतः इस प्रारंभिक पंक्ति को शीर्षक-सरीखा साधारण वक्तव्य माना है, जिसके भीतर अपने आप में कोई स्वतंत्र विधिक विवाद नहीं है। धारा 53 के तहत न्यायिक चर्चा प्रायः इसके बाद दी गई विशिष्ट दंड-श्रेणियों पर केंद्रित रहती है (जैसे Bachan Singh v. State of Punjab, 1980 में मृत्यु-दंड संबंधी दिशा-निर्देश, जिन्होंने मृत्यु-दंड को ‘दुर्लभतम से भी दुर्लभ’ मामलों तक सीमित किया), न कि इस आरंभी उपवाक्य पर।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह पंक्ति स्वयं कोई दंड निर्धारित करती है।
तथ्य: यह किसी दंड का निर्धारण नहीं करती; यह केवल उन दंडों की सूची का परिचय कराती है जो आगे धारा 53 में दी गई है।