Skip to content
सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 52

repealed

Good faith

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय दंड संहिता (IPC) कई स्थानों पर ‘सद्भावना’ शब्द का उपयोग करती है (उदाहरण के लिए, ईमानदारी से किए गए कृत्यों के लिए बचाव के रूप में, जैसे किसी चिकित्सक द्वारा मरीज़ का उपचार या किसी अधिकारी द्वारा आदेशों का पालन)। मसौदा-निर्माताओं का उद्देश्य था कि लोग “मेरी नीयत अच्छी थी” कहकर उटपटांग या लापरवाह आचरण को छूट न दिला सकें। इसलिए धारा 52 एक न्यून-सीमा तय करती है: केवल नीयत की ईमानदारी पर्याप्त नहीं — साथ में उचित सावधानी और ध्यान भी होना चाहिए। इससे सद्भावना का संबंध मात्र निष्कपट नीयत से नहीं, बल्कि युक्तिसंगत परिश्रम के मानक से जोड़ा जाता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने लगातार माना है कि IPC के अंतर्गत ‘सद्भावना’ के लिए उद्देश्य की ईमानदारी के साथ-साथ युक्तिसंगत सावधानी दोनों आवश्यक हैं, और केवल बुरे उद्देश्य का अभाव पर्याप्त नहीं। अदालतें प्रायः देखती हैं कि अभियुक्त की स्थिति में एक समझदार व्यक्ति कार्यवाही से पहले और जाँच-पड़ताल करता या अधिक सतर्कता बरतता या नहीं — खासकर उन मामलों में जहाँ लोकसेवक, चिकित्सक या अन्य अधिकारी IPC के अन्य प्रावधानों के अंतर्गत सद्भावना-आधारित बचाव का दावा करते हैं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: सद्भावना का अर्थ केवल इतना है कि आपने कुछ गलत करने की नीयत नहीं रखी।

    तथ्य: अदालतें ईमानदार नीयत और युक्तिसंगत सावधानी — दोनों की अपेक्षा करती हैं; लापरवाही, बुरे इरादे के बिना भी, सद्भावना के दावे को विफल कर देती है।

  • मिथक: धारा 52 स्वयं एक सद्भावना-आधारित बचाव प्रदान करती है।

    तथ्य: धारा 52 कोई बचाव उत्पन्न नहीं करती — यह सिर्फ जहाँ-जहाँ भी IPC या अन्य क़ानूनों में ‘सद्भावना’ शब्द आता है, उसका अर्थ निर्धारित करती है।