Indian Penal Code, 1860
धारा 51
repealedOath
The word “oath” includes a solemn affirmation substituted by law for an oath, and any declaration required or authorized by law to be made before a public servant or to be used for the purpose of proof, whether in a Court of Justice or not.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
ब्रिटिश-कालीन भारतीय क़ानून ने माना था कि हर व्यक्ति धार्मिक शपथ नहीं लेगा (कुछ समुदायों या व्यक्तियों के धार्मिक/विचारगत आधार पर एतराज़ हो सकते हैं)। इसलिए क़ानून ने ‘गंभीर प्रतिज्ञान’ को समान वैधानिक प्रभाव वाले धर्मनिरपेक्ष विकल्प के रूप में स्वीकार किया। धारा 51 इस उद्देश्य से बनाई गई कि बाद की भारतीय दंड संहिता (IPC) की वे धाराएँ जो शपथ से संबंधित हैं (जैसे धारा 191-193 के अंतर्गत झूठी गवाही) स्वतः ही प्रतिज्ञानों और अन्य विधिसम्मत घोषणाओं पर भी लागू हों—ताकि कोई व्यक्ति केवल इसलिए दायित्व से न बच सके कि उसने शपथ के बजाय प्रतिज्ञान किया, या किसी न्यायालय के बाहर घोषणा की।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कथन ग़लत है: क़ानून में केवल धार्मिक शपथ ही ‘शपथ’ नहीं मानी जाती; प्रतिज्ञान की वैधानिक हैसियत कम नहीं होती।
तथ्य: धारा 51 स्पष्ट करती है कि शपथ के क़ानूनी विकल्प के रूप में किया गया गंभीर प्रतिज्ञान, हर वैधानिक प्रयोजन के लिए—झूठ बोलने पर दंड सहित—शपथ के समान ही माना जाएगा।
मिथक: यह कथन ग़लत है: शपथ-संबंधी क़ानून (जैसे झूठी गवाही) केवल न्यायालय के अंदर दिए गए कथनों तक सीमित नहीं हैं।
तथ्य: धारा 51 ‘शपथ’ के अर्थ का विस्तार कर उन घोषणाओं को भी समाहित करती है जिन्हें किसी लोक सेवक के समक्ष क़ानूनन अपेक्षित या अधिकृत किया गया हो, या जो प्रमाण के लिए प्रयुक्त हों—सिर्फ़ न्यायालय-ए-अदालत (Court of Justice) तक सीमित नहीं।