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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 46

repealed

Death

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

आईपीसी में कई परिभाषात्मक धाराएँ (धारा 6 से 52A) हैं, जिनका उद्देश्य संहिता में बार‑बार आने वाले सामान्य शब्दों का स्थिर अर्थ निर्धारित करना है, ताकि हर मुकदमे में बुनियादी शब्दों पर अनुमान या विवाद न करना पड़े। क्योंकि संहिता का मुख्य फोकस मानव जीवन और संपत्ति के विरुद्ध अपराध हैं, मसौदा‑निर्माताओं (लॉर्ड मैकॉले की विधि आयोग के नेतृत्व में) ने स्पष्ट किया कि ‘मृत्यु’ का सामान्य अर्थ मानव‑मृत्यु है। ‘जब तक संदर्भ विपरीत न दर्शाए’ जैसी क्लॉज़ लचीलेपन के लिए जोड़ी गई, ताकि आवश्यकता पड़ने पर किसी प्रावधान में इस शब्द का दायरा भिन्न रखा जा सके।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने हत्या, आपराधिक मानव‑हत्या और संबंधित अपराधों (धारा 299‑304 आईपीसी) जैसे मामलों में इस परिभाषा को सीधा ही अपनाया है, और ‘मृत्यु’ को मानव पीड़ित की मृत्यु माना है। धारा 46 की स्वतंत्र व्याख्या पर विशेष न्यायनिर्णय कम हैं, क्योंकि इसका काम मुख्यतः व्याख्यात्मक और पृष्ठभूमिगत है — यह अन्य सारगर्भित धाराओं के पढ़ने का आधार देती है, स्वयं प्रायः प्रत्यक्ष विवाद का विषय नहीं बनती।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: धारा 46 यह परिभाषित करती है कि मृत्यु किस कारण से होती है या चिकित्सकीय रूप से मृत्यु का निर्धारण कैसे किया जाता है।

    तथ्य: यह केवल आईपीसी के पाठ में प्रयुक्त ‘मृत्यु’ शब्द के अर्थ को स्पष्ट करती है — यह मृत्यु के चिकित्सकीय या फॉरेंसिक निर्धारण से संबंधित नहीं है।

  • मिथक: आईपीसी में ‘मृत्यु’ में स्वभावतः किसी जानवर की मृत्यु भी शामिल हो सकती है।

    तथ्य: डिफ़ॉल्ट रूप से इसका अर्थ केवल मानव‑मृत्यु है; पशु‑मृत्यु अलग विशिष्ट धाराओं से संबोधित की जाती है, जब तक किसी धारा का संदर्भ स्पष्ट रूप से अर्थ का विस्तार न करे।