Indian Penal Code, 1860
धारा 45
repealedLife
The word “life” denotes the life of a human being, unless the contrary appears from the context.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भारतीय दंड संहिता (IPC) में परिभाषात्मक धाराओं का एक समूह है (धारा 6 से 52A तक) जो संहिता में बार-बार आने वाले सामान्य शब्दों के निश्चित अर्थ तय करता है, ताकि अदालतों और नागरिकों को हर बार अनुमान न लगाना पड़े। धारा 45 यह स्पष्ट करती है कि आपराधिक क़ानून के संदर्भों में—जैसे जीवन पर आघात से जुड़े अपराध, उदाहरणार्थ हत्या या मानव वध—‘जीवन’ से अभिप्राय मानव जीवन है, न कि पशुओं या पौधों का जीवन, जब तक किसी विशेष धारा में अलग से कुछ न कहा गया हो। इससे उन गंभीर अपराधों में अस्पष्टता नहीं रहती जहाँ ‘जीवन’ आरोप का केन्द्रीय तत्व होता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने सामान्यतः इस परिभाषा को सीधे लागू किया है और यह पुष्टि की है कि हत्या (धारा 300) तथा मानव वध (धारा 299) जैसे अपराध केवल मानव की मृत्यु का कारण बनने वाले कृत्यों पर लागू होते हैं। ‘जब तक संदर्भ से विपरीत अभिप्राय न निकले’ वाला अपवाद खंड अदालतों को विशिष्ट प्रावधानों में, जहाँ क़ानून स्पष्ट रूप से व्यापक या संकीर्ण अर्थ चाहता है, ‘जीवन’ की अलग व्याख्या करने की गुंजाइश देता है; हालाँकि ऐसे अपवाद विरले होते हैं और विशेष वैधानिक भाषा तक सीमित रहते हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: IPC में ‘जीवन’ शब्द का अर्थ किसी भी जीवित वस्तु—जिनमें पशु या पौधे भी शामिल हैं—हो सकता है।
तथ्य: धारा 45 यह स्पष्ट करती है कि ‘जीवन’ का अर्थ मानव जीवन है, जब तक किसी प्रावधान के विशिष्ट संदर्भ से कुछ और अभिप्रेत न दिखे।