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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 358

repealed

Assault or criminal force on grave provocation

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

कानून मानता है कि अचानक और गंभीर उकसावा एक सामान्य व्यक्ति को बिना पूर्वविचार के शारीरिक प्रतिक्रिया देने पर मजबूर कर सकता है। ऐसे मामले में बिना उकसावे वाले हमले जितना कड़ा दंड देने के बजाय, यह धारा बहुत हल्की सजा का प्रावधान करती है—जैसे अन्य भारतीय दंड संहिता की धाराओं में उकसावे के कारण हत्या का अपराध घटकर आपराधिक मानव वध हो जाता है। भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत, यह अपराध समकक्ष उकसावे‑आधारित आक्रमण के प्रावधान से आच्छादित है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने कहा है कि उकसावा गंभीर और अचानक होना चाहिए तथा उसी व्यक्ति से आना चाहिए जिस पर आक्रमण हुआ; जो उकसावा आरोपी ने स्वयं तलाशा हो या जानबूझकर करवाया हो, या जो बासी/पुराना हो, उसके आधार पर यह हलकी सजा नहीं मिलती।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि कोई भी बहाना ‘उकसावा’ मानकर हलकी सजा दिला सकता है।

    तथ्य: उकसावा गंभीर और अचानक होना चाहिए और उसी व्यक्ति से आना चाहिए जिस पर आक्रमण हुआ; मामूली, गढ़ा‑गढ़ाया, या बहुत पुराने कारण इस हलकी सजा के लिए स्वीकार्य नहीं हैं।