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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 25

repealed

Fraudulently

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय दंड संहिता साधारण दिखने वाले शब्द जैसे ‘धोखेबाज़ी से’ और ‘अमानदारी से’ को तकनीकी अर्थों में इस्तेमाल करती है, क्योंकि अनेक अपराध (जैसे जालसाज़ी, ठगी, संपत्ति का छलपूर्वक हटाना आदि) में इसी खास मानसिक अवस्था का सबूत चाहिए। भ्रम से बचाने के लिए धारा 25 जोड़ी गई — यह ‘धोखेबाज़ी से’ को सख्ती से ‘धोखा देने की मंशा’ से जोड़ती है, और इसे महज़ अमानदारी (जो धारा 24 के तहत संपत्ति में अनुचित लाभ या अनुचित हानि से संबंधित है) या साधारण लापरवाही से अलग करती है। इससे अदालतें तभी दोषसिद्धि करती हैं जब सच में छल की नीयत थी, न कि केवल इसलिए कि कुछ गड़बड़ हो गई।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतें लंबे समय से ‘धोखा देने की मंशा’ से वास्तव में क्या अपेक्षित है, इससे जूझती रही हैं, क्योंकि संहिता इसे आगे परिभाषित नहीं करती। Dr. Vimla v. State of Punjab (AIR 1963 SC 1572) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ‘धोखा देने की मंशा’ प्रायः दो तत्त्वों को समेटती है: छल (किसी को झूठ को सच मानने पर मजबूर करना) और पीड़ित या किसी अन्य को होने वाली चोट — और स्पष्ट किया कि ‘चोट’ केवल आर्थिक हानि तक सीमित नहीं; इसमें उस अधिकार, संपत्ति या अवसर से वंचित करना भी शामिल हो सकता है, जिसका व्यक्ति हक़दार था। अदालतों ने इसी कसौटी से असली धोखे को उन कृत्यों से अलग किया है जो केवल गुमराह करते हैं पर वास्तविक चोट नहीं पहुँचाते, और जालसाज़ी व ठगी जैसे अपराधों में ‘धोखेबाज़ी से’ को ‘अमानदारी से’ से अलग पहचाना है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: ‘धोखेबाज़ी से’ और ‘अमानदारी से’ भारतीय क़ानून में एक ही अर्थ रखते हैं।

    तथ्य: वे क़ानूनी रूप से अलग हैं। ‘अमानदारी से’ (धारा 24) का केंद्र बिंदु संपत्ति में अनुचित लाभ दिलाना या अनुचित हानि पहुँचाना है, जबकि ‘धोखेबाज़ी से’ (धारा 25) का केंद्र छल की मंशा है, जिसके बारे में अदालतें कहती हैं कि आम तौर पर इसके साथ कोई परिणामी चोट का तत्व भी होता है, केवल संपत्ति-हानि मात्र नहीं।

  • मिथक: धोखे का मतलब हमेशा किसी का पैसा खोना ही होता है।

    तथ्य: अदालतों ने स्पष्ट किया है कि धोखे से होने वाली ‘चोट’ केवल वित्तीय नहीं होती — इसमें किसी अधिकार से वंचित किया जाना, किसी अवसर से वंचित होना, या ऐसी ठगी से प्रभावित होना शामिल है जो मौद्रिक हानि के बिना भी नुकसान पहुँचाती है।