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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 24

repealed

Dishonestly

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

आईपीसी के प्रारूपकार (Lord Macaulay के नेतृत्व में) ने “बेईमानी” की एक सटीक और बार‑बार प्रयोज्य परिभाषा इसलिए दी, क्योंकि यह शब्द बाद की अनेक आपराधिक धाराओं—जैसे छल, ग़लत ढंग से आत्मसात करना, तथा चोरी—में आता है। हर जगह अलग परिभाषा देने के बजाय, धारा 24 “अनुचित लाभ” या “अनुचित हानि” (दोनों की अलग परिभाषाएँ धारा 23 में) से जुड़ी एक मानक अर्थ-सीमा तय करती है, जिससे समूचे संहिता में न्यायालय एक समान कसौटी लागू करें।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालय निरंतर मानते आए हैं कि धारा 24 के तहत बेईमानी सिद्ध करने के लिए धारा 23 के अनुसार परिभाषित “अनुचित लाभ” या “अनुचित हानि” पहुँचाने के इरादे का प्रमाण आवश्यक है—केवल अनुबंध का उल्लंघन, नैतिक त्रुटि, या दीवानी देनदारी अपने‑आप में पर्याप्त नहीं है। क्योंकि सीधे साक्ष्य विरले मिलते हैं, न्यायालय अभियुक्त की मानसिक अवस्था और परिवेशगत तथ्यों से इस इरादे का अनुमान लगाते हैं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: कोई भी झूठ या अनुचित व्यवहार इस धारा के तहत “बेईमानी” नहीं कहलाता।

    तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि धारा 24 तभी लागू होती है जब धारा 23 में विशेष रूप से परिभाषित अनुचित लाभ या अनुचित हानि पहुँचाने का इरादा हो—सामान्य अन्याय या केवल नैतिक त्रुटि अपने आप में पर्याप्त नहीं है।

  • मिथक: किसी कार्य को बेईमान माने जाने के लिए आपका वास्तव में लाभ पाना या हानि करवाना आवश्यक है।

    तथ्य: यह धारा कार्य के समय के इरादे पर केंद्रित है; लाभ या हानि वास्तव में हुई या नहीं, यह अक्सर अन्य अपराधों के लिए प्रासंगिक हो सकता है, पर धारा 24 स्वयं तो बेईमान इरादे की परिभाषा करती है।