Skip to content
सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 23

repealed

Wrongful gain

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

धारा 23 आईपीसी (IPC) के ‘परिभाषा’ अध्याय का भाग है, जिसे उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में थॉमस मैकाले की विधि आयोग के अधीन तैयार किया गया था। प्रारूपकों ने ऐसी सटीक और बार-बार उपयोग होने वाली परिभाषाएँ गढ़ीं ताकि बाद की धाराओं (जैसे चोरी, धोखा और आपराधिक न्यासभंग) में हर बार मूल अवधारणाएँ फिर से न लिखनी पड़ें। ‘अनुचित लाभ’ और उसका समकक्ष ‘अनुचित हानि’ साथ-साथ काम करते हैं: प्रायः एक व्यक्ति का अवैध लाभ किसी अन्य की अवैध हानि से मेल खाता है, और दोनों मिलकर धारा 24 में ‘बेईमानी’ (dishonestly) की परिभाषा को स्पष्ट करते हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने सामान्यतः इस परिभाषा का उपयोग एक आधार-ईंट की तरह किया है, न कि इसे स्वयं में कोई स्वतंत्र अपराध माना है। R.K. Dalmia v. Delhi Administration (1962) में, सर्वोच्च न्यायालय ने आपराधिक न्यासभंग की व्याख्या करते समय ‘संपत्ति’ के दायरे को अनुचित लाभ और हानि के संदर्भ में परखा, और माना कि इस शब्द को व्यापक रूप से पढ़ा जाना चाहिए ताकि यह केवल भौतिक चल संपत्तियों तक सीमित न रहे। न्यायाधीश प्रायः इस परिभाषा को धारा 24 (बेईमानी) और धारा 415 (धोखा) के साथ पढ़ते हैं, न कि इसे अलग-थलग करके।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: ‘अनुचित लाभ’ का मतलब केवल नक़द या गहनों जैसे भौतिक सामान की चोरी तक सीमित है।

    तथ्य: अदालतों ने इस परिभाषा के तहत ‘संपत्ति’ को व्यापक अर्थ में पढ़ा है, और यह केवल भौतिक वस्तुओं तक सीमित न रहकर, परिस्थितियों और विशिष्ट अपराधों (जैसे आपराधिक न्यासभंग) में उसके उपयोग के अनुसार, अन्य प्रकार की संपत्ति या लाभों तक भी फैल सकती है।

  • मिथक: धारा 23 स्वयं में कोई दंडनीय अपराध है।

    तथ्य: यह धारा सिर्फ़ एक पद की परिभाषा देती है; अपने-आप में अपराध निर्मित नहीं करती। इसे आईपीसी (IPC) की अन्य धाराओं, जैसे धोखा (415) और बेईमानी (24), की व्याख्या हेतु इस्तेमाल किया जाता है।