Indian Penal Code, 1860
धारा 228A
repealedDisclosure of identity of the victim of certain offences, etc
Provided that no such authorisation shall be given by the next-of-kin to anybody other than the chairman or the secretary, by whatever name called, of any recognised welfare institution or organisation.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भारतीय दंड संहिता की धारा 228A वर्ष 1983 में जोड़ी गई, मुख्यतः बलात्कार व यौन उत्पीड़न की पीड़िताओं के नाम सार्वजनिक करने से उपजने वाले कलंक और अतिरिक्त क्षति की चिंताओं के जवाब में। यह धारा सामान्य तौर पर ऐसे मामलों में पीड़िता की पहचान छापने या प्रकाशित करने पर रोक लगाती है। यह विशेष अपवाद-विधि (प्रोवाइज़ो) एक सीमित और नियंत्रित छूट बनाती है: यदि परिवार प्रकटीकरण की अनुमति देना चाहे (उदाहरण के लिए, पीड़िता की मदद कर रहे किसी सहयोगी संगठन को), तो वे केवल किसी मान्यता प्राप्त कल्याणकारी निकाय के विशिष्ट वरिष्ठ पदाधिकारी—अध्यक्ष या सचिव—को ही अधिकृत कर सकते हैं, ताकि अनधिकृत व्यक्तियों या माध्यमों द्वारा इस अपवाद का दुरुपयोग न हो।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कथन गलत है: परिवार सहमति देकर किसी भी व्यक्ति—जैसे रिपोर्टर या पारिवारिक मित्र—को पीड़िता की पहचान उजागर करने की अनुमति नहीं दे सकता।
तथ्य: कानून इस अनुमति को सख्ती से किसी मान्यता प्राप्त कल्याणकारी संस्था के अध्यक्ष या सचिव तक ही सीमित करता है, किसी अन्य व्यक्ति तक नहीं।