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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 229

repealed

Personation of a juror or assessor

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

उन्नीसवीं सदी में, भारतीय न्यायालय कुछ मामलों में ज्यूरर और असेसर (ऐसे सामान्य नागरिक जो विशेषकर आपराधिक मुकदमों में तथ्य निर्धारण में न्यायाधीश की सहायता करते थे) का उपयोग करते थे। किसी भी मुकदमे की निष्पक्षता इस पर निर्भर करती थी कि इन भूमिकाओं में योग्य और सही लोग सेवा करें। धारा 229 का उद्देश्य ज्यूरी/असेसर के चयन में छल या प्रतिरूपण को रोकना था — ताकि अयोग्य या बेईमान व्यक्ति अधिकार होने का ढोंग कर के मुकदमों की निष्पक्षता से छेड़छाड़ न कर सकें।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा आज के भारत में होने वाले ज्यूरी ट्रायल से संबंधित है।

    तथ्य: भारत में 1959 के बाद (K.M. Nanavati मामले के उपरांत) ज्यूरी ट्रायल समाप्त कर दिए गए, इसलिए यह धारा मुख्यतः ऐतिहासिक और अवशिष्ट परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक है, जैसे कुछ कार्यवाहियों में असेसर के संदर्भ में।

  • मिथक: यहाँ अपराध तभी बनता है जब कोई विशेष नामित व्यक्ति का प्रतिरूपण किया जाए।

    तथ्य: यह धारा उस व्यक्ति को भी दंडित करती है जो बिना किसी और का प्रतिरूपण किए, केवल यह जानते हुए भी कि उसका ज्यूरर/असेसर के रूप में चयन गलत या गैरकानूनी था, फिर भी जानबूझकर सेवा करना चुनता है।