Indian Penal Code, 1860
धारा 228
repealedIntentional insult or interruption to public servant sitting in judicial proceeding
Whoever intentionally offers any insult, or causes any interruption to any public servant, while such public servant is sitting in any stage of a judicial proceeding, shall be punished with simple imprisonment for a term which may extend to six months, or with fine which may extend to one thousand rupees, or with both.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान 1860 के मूल भारतीय दंड संहिता का भाग था, जिसे थॉमस मैकाले की विधि आयोग के प्रभाव में ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन के तहत तैयार किया गया। इसका उद्देश्य न्यायालयी कार्यवाहियों की गरिमा और सुचारु संचालन की रक्षा करना है—ऐसे आचरण को निरुत्साहित कर जो न्यायालय का अनादर करे या उसे बाधित करे—ताकि न्यायाधीश और समान अधिकारी पक्षकारों, दर्शकों या अन्य उपस्थित लोगों की ओर से जानबूझकर हस्तक्षेप या अपमान के बिना सुनवाई कर सकें।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
न्यायालयों ने सामान्यतः माना है कि अपमान या व्यवधान जानबूझकर होना चाहिए और तब होना चाहिए जब लोक सेवक वास्तव में न्यायिक कार्यवाही में विराजमान हो—अर्थात अदालतें मात्र असभ्यता या अनजाने में हुई खलल नहीं, बल्कि सोची-समझी हरकत का स्पष्ट प्रमाण मांगती हैं। न्यायिक व्याख्या ने यह भी स्पष्ट किया है कि यहां ‘लोक सेवक’ में वे न्यायाधीश, दण्डाधिकारी और वे अर्द्ध-न्यायिक (क्वाज़ी-ज्यूडिशियल) अधिकारी शामिल हैं जो न्यायिक कार्य कर रहे हों, न कि सामान्यतः सभी सरकारी अधिकारी।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: न्यायाधीश के फैसले से कोई भी असहमति या बहस इस धारा के अंतर्गत अपराध मानी जाती है।
तथ्य: अदालतें मांग करती हैं कि अपमान या व्यवधान जानबूझकर हो और कार्यवाही को बाधित करने के लिए ही लक्षित हो—सिर्फ फैसले से असहमत होना या सम्मानजनक कानूनी दलील रखना इस दायरे में नहीं आता।
मिथक: यह धारा किसी भी सरकारी कर्मचारी के प्रति किए गए अपमान पर लागू होती है।
तथ्य: यह विशेष रूप से उस लोक सेवक पर लागू होती है जो न्यायिक कार्यवाही में विराजमान हो, जैसे न्यायाधीश या दण्डाधिकारी; यह सामान्य प्रसंगों में सभी सरकारी अधिकारियों पर लागू नहीं होती।