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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 211

repealed

False charge of offence made with intent to injure

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान 1860 के मूल भारतीय दंड संहिता (IPC) में इसलिए शामिल किया गया था ताकि फौजदारी न्याय प्रणाली का निजी बदले या उत्पीड़न के औजार के रूप में दुरुपयोग रोका जा सके। औपनिवेशिक दौर के विधि-निर्माताओं ने समझा कि किसी पर अपराध का आरोप लगाने की शक्ति स्वयं एक हथियार बन सकती है, इसलिए उन्होंने जान-बूझकर निराधार अभियोजन या शिकायतों के विरुद्ध एक प्रतिरोधक (deterrent) व्यवस्था की।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालय लगातार यह मानते आए हैं कि केवल बरी होना या वाद की खारिजी अपने आप में धारा 211 के लागू होने का मतलब नहीं है — अभियोजन को अलग से यह सिद्ध करना होता है कि मूल शिकायतकर्ता ने स्पष्ट दुर्भावनापूर्ण इरादा रखते हुए और यह पूरी जानकारी होने पर कि आरोप झूठा या निराधार है, कार्य किया। न्यायालयों ने रेखांकित किया है कि ईमानदार, भले ही भूलवश की गई, शिकायतें संरक्षित हैं; केवल जान-बूझकर झूठे और द्वेषपूर्ण आरोप ही इस धारा के दायरे में आते हैं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यदि किसी व्यक्ति को आपराधिक मामले में बरी कर दिया जाए, तो उसके खिलाफ शिकायत करने वाले को स्वतः ही धारा 211 के तहत दंडित किया जा सकता है।

    तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि केवल बरी होना पर्याप्त नहीं है — अलग से यह सिद्ध होना चाहिए कि शिकायतकर्ता को मालूम था कि आरोप झूठा है और उसने हानि पहुँचाने के इरादे से कार्य किया।

  • मिथक: यह धारा हर उस शिकायत पर लागू होती है जो बाद में गलत या भूलवश निकले।

    तथ्य: ईमानदार भूलें या सद्भावना में की गई शिकायतें, चाहे बाद में गलत साबित हों, दंडनीय नहीं हैं — कानून केवल जान-बूझकर झूठे और द्वेषपूर्ण आरोपों को ही निशाना बनाता है।