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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 212

repealed

Harbouring offender

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

धारा 212 इस उद्देश्य से बनाई गई थी कि अपराध हो जाने के बाद लोग अपराधियों को न्याय से बचाने में मदद न करें। औपनिवेशिक काल के क़ानून-निर्माताओं ने माना कि अपराधियों की गिरफ़्तारी अक्सर इस पर निर्भर करती है कि जनता उन्हें न छुपाए; इसलिए इस प्रावधान में किसी की गिरफ़्तारी या दंड रोकने के लिए जानबूझकर उसकी रक्षा करने या उसे छुपाने को स्वयं एक अपराध माना गया है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने सामान्यतः दो बातों के प्रमाण की अपेक्षा की है: पहली, अभियुक्त जानता था या उसके पास यह मानने का उचित कारण था कि वह व्यक्ति अपराधी है; और दूसरी, छिपाना विशेष रूप से उसे क़ानूनी दंड से बचाने के लिए किया गया था। मात्र मेलजोल या अनजाने में दी गई सहायता इस धारा के अंतर्गत आश्रय (हार्बरिंग) नहीं मानी जाती।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कथन ग़लत है: पुलिस से दोस्त या परिजन को छिपाने में मदद करना, केवल निष्ठा के नाम पर सूचित न करने से, कभी भी स्वतः मान्य नहीं होता।

    तथ्य: अदालतों ने माना है कि किसी व्यक्ति को दंड से बचाने के उद्देश्य से जानबूझकर उसे छिपाना अपने आप में दंडनीय कृत्य है, पक्षकारों के आपसी संबंध से परे।

  • मिथक: यह ज़रूरी नहीं कि आपको सौ प्रतिशत यक़ीन हो कि कोई अपराधी है, तभी यह क़ानून लागू होगा—यह कथन ग़लत है।

    तथ्य: यदि आपके पास यह ‘कारण-से-विश्वास’ हो कि उस व्यक्ति ने अपराध किया है, तो पूर्ण निश्चय न होने पर भी यह क़ानून लागू हो सकता है।