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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 20

repealed

Court of Justice

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय दंड संहिता में ‘न्यायालय’ शब्द का प्रयोग कई अपराधों में हुआ है, जैसे अवमानना, झूठा साक्ष्य देना, या लोक न्याय के विरुद्ध अपराध। इस अनुभाग को इस वाक्यांश का स्पष्ट, तकनीकी अर्थ निश्चित करने के लिए जोड़ा गया ताकि उसका आशय ‘कोर्ट’ के अनौपचारिक बोलचाल वाले अर्थ पर न टिका रहे। इससे यह सुनिश्चित होता है कि ‘न्यायालय के समक्ष’ किए गए अपराधों के लिए दंडनीयता तभी लगे जब वास्तविक न्यायिक शक्ति से संपन्न व्यक्ति उस शक्ति का उपयोग कर रहा हो, न कि केवल औपचारिक पद धारण करने या अपनी न्यायिक भूमिका के बाहर बैठने भर से।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने सामान्यतः इस परिभाषा को धारा 19 (जो ‘न्यायाधीश’ को परिभाषित करती है) के साथ पढ़कर यह तय किया है कि किन्हीं विशिष्ट अधिकारियों या अधिकरणों को झूठी गवाही या अवमानना जैसे अपराधों के संदर्भ में ‘न्यायालय’ माना जाए या नहीं। न्यायालयों ने माना है कि मुख्य कसौटी कार्यात्मक है: व्यक्ति या निकाय को विधि द्वारा न्यायिक रूप से निर्णय देने का अधिकार होना चाहिए और प्रासंगिक समय पर वह वास्तव में उसी न्यायिक क्षमता में कार्यरत होना चाहिए, न कि प्रशासनिक या किसी अन्य भूमिका में। अधिकरणों और अर्ध-न्यायिक निकायों की इस कार्यात्मक कसौटी पर मामले-दर-मामला जांच की गई है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: जहाँ भी कोई न्यायाधीश उपस्थित हो, वह हर स्थान ‘न्यायालय’ माना जाएगा।

    तथ्य: इस अनुभाग के तहत, तभी ‘न्यायालय’ माना जाएगा जब न्यायाधीश या न्यायाधीशों के पास न्यायिक रूप से कार्य करने का वैधानिक अधिकार हो और वे उस समय वास्तव में उसी न्यायिक क्षमता में कार्य कर भी रहे हों; अन्य किसी प्रसंग में नहीं।

  • मिथक: ‘न्यायालय’ का अर्थ केवल एक अकेला न्यायाधीश होता है।

    तथ्य: यह परिभाषा एक अकेले न्यायाधीश द्वारा अकेले कार्य करने के साथ-साथ संयुक्त रूप से पीठ के रूप में कार्य करने वाले न्यायाधीशों के समूह—दोनों को समेटती है।