Indian Penal Code, 1860
धारा 19
repealedJudge
The word “Judge” denotes not only every person who is officially designated as a Judge, but also every person. who is empowered by law to give, in any legal proceeding, civil or criminal, a definitive judgment, or a judgment which, if not appealed against, would be definitive, or a judgment which, if confirmed by some other authority, would be definitive, or who is one of a body of persons, which body of persons is empowered by law to give such a judgment.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
IPC कई अपराधों में ‘न्यायाधीश’ शब्द का उपयोग करता है (जैसे भ्रष्ट आचरण या न्यायालय-अपमान से जुड़े कृत्यों में), इसलिए एक कार्यात्मक परिभाषा आवश्यक थी। केवल पदनाम पर निर्भर रहने के बजाय, विधि-निर्माताओं ने यह सुनिश्चित किया कि कानून उन सब पर लागू हो जो वास्तव में न्यायिक निर्णय लेने की शक्ति का प्रयोग करते हैं — जैसे अधिकरण (ट्रिब्यूनल) के सदस्य, पीठ के निर्णायक, या अर्ध-न्यायिक अधिकारी — ताकि लेबल नहीं, बल्कि काम का वास्तविक स्वरूप निर्णायक हो।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने सामान्यतः इस परिभाषा को व्यापक और कार्य-आधारित रूप में पढ़ा है, और माना है कि पंच (आर्बिट्रेटर), अधिकरण के सदस्य, या विधि द्वारा नियुक्त निर्णयाधिकारी जैसे प्राधिकारी, यदि उनके निर्णयों में वर्णित अंतिमता है, तो वे IPC के तहत ‘न्यायाधीश’ ठहर सकते हैं, भले ही उनका आधिकारिक पदनाम भिन्न हो (उदा., ‘अध्यक्ष अधिकारी’ या ‘सदस्य’)।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: केवल वे लोग जिन्हें आधिकारिक रूप से ‘न्यायाधीश’ कहा जाता है, भारतीय कानून में न्यायाधीश गिने जाते हैं।
तथ्य: IPC की धारा 19 के तहत, जो भी व्यक्ति विधि द्वारा किसी कानूनी मामले में अंतिम (या लगभग अंतिम) निर्णय देने का अधिकार रखता है, वह अपने आधिकारिक पदनाम की परवाह किए बिना ‘न्यायाधीश’ माना जाता है।
मिथक: किसी समूह या पीठ को कभी भी ‘न्यायाधीश’ नहीं माना जा सकता।
तथ्य: यह धारा विशेष रूप से ऐसे निकायों/समूहों को भी शामिल करती है जिनके सदस्य मिलकर ऐसे निर्णय देने की शक्ति रखते हैं, अतः पीठें या अधिकरण भी इस परिभाषा के अंतर्गत आ सकते हैं।