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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 199

repealed

False statement made in declaration which is by law receivable as evidence

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

कई कानून लोगों को यह सुविधा देते हैं कि वे प्रत्यक्ष उपस्थित होकर मौखिक साक्ष्य देने के बजाय लिखित घोषणाओं से तथ्य सिद्ध करें—जैसे हलफनामे, कर घोषणाएँ, या वैधानिक प्रपत्र। धारा 199 यह सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई कि इस सुविधा का दुरुपयोग न हो। यदि घोषणाएँ बिना दंड के झूठी बनाई जा सकें, तो लिखित वक्तव्यों को साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने की पूरी व्यवस्था ढह जाएगी। इसलिए कानून ऐसी घोषणा में किसी महत्वपूर्ण तथ्य के बारे में झूठे कथन को उतनी ही गंभीरता से लेता है जितना न्यायालय में दिया गया झूठा साक्ष्य, और उसी प्रकार दंडित करता है (देखें धारा 191 और 193 IPC कि ‘झूठा साक्ष्य’ कैसे परिभाषित और दंडित होता है)।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों का सामान्य मत रहा है कि झूठा कथन उस तथ्य से संबंधित होना चाहिए जो उस घोषणा के उद्देश्य के लिए ‘महत्वपूर्ण’ हो—तुच्छ या अप्रासंगिक असत्य इस धारा को आकर्षित नहीं करते। विभिन्न वादों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि घोषणा वही होनी चाहिए जिसे किसी कानून ने विशेष रूप से साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने के लिए अधिकृत किया हो; कोई भी निजी लिखित कागज़ तब तक योग्य नहीं है जब तक किसी विधि ने उसे वह साक्ष्यात्मक दर्जा न दिया हो। न्यायालयों ने इस धारा को न्यायिक या अर्ध-न्यायिक कार्यवाहियों में दायर हलफनामों और वैधानिक घोषणाओं पर लागू किया है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि झूठ तभी माना जाएगा जब आप न्यायालय में शपथ लेकर ऊँची आवाज़ में बोलें।

    तथ्य: यह धारा दर्शाती है कि जिस लिखित घोषणा को कानून साक्ष्य मानता है उसमें झूठ बोलना, मौखिक गवाही में झूठ बोलने के बिल्कुल समान रूप से दंडनीय है।

  • मिथक: किसी भी दस्तावेज़ में किसी भी तरह का झूठा कथन अपने-आप इस धारा के दायरे में नहीं आता।

    तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि घोषणा वही होनी चाहिए जिसे कोई कानून विशेष रूप से साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने की अनुमति देता है, और झूठा कथन उसी तथ्य के बारे में होना चाहिए जो उस घोषणा के उद्देश्य के लिए महत्वपूर्ण हो।