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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 198

repealed

Using as true a certificate known to be false

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

प्रमाणपत्र—जैसे शैक्षणिक डिग्री, चिकित्सकीय फिटनेस प्रमाणपत्र, या आधिकारिक प्रमाणीकरण—ऐसे भरोसेमंद दस्तावेज़ हैं जिनसे बिना साक्षी बुलाए तथ्य सिद्ध किए जाते हैं। कानून मानता है कि झूठा प्रमाणपत्र तब ही खतरनाक होता है जब कोई वास्तव में उस पर निर्भर करता है या उसे असली बताकर पेश करता है। धारा 198, धारा 197 से छूटी कड़ी को जोड़ती है: यह जाली प्रमाणपत्र के ‘उपयोगकर्ता’ को दंडित करती है, केवल उसके बनाने वाले को नहीं, ताकि झूठे दस्तावेजी साक्ष्य का निर्माण और उसे जानबूझकर प्रयोग—दोनों को अदालत में झूठ बोलने जितना ही गंभीर माना जाए।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने सामान्यतः माना है कि दो बातें साथ‑साथ सिद्ध होनी चाहिए—दोषपूर्ण जानकारी (कि प्रमाणपत्र झूठा है) का ज्ञान, और भ्रष्ट उद्देश्य (धोखा देने या अनुचित लाभ लेने की नीयत)। केवल कब्जे में होना या भूलवश गलत प्रमाणपत्र का निष्कपट उपयोग पर्याप्त नहीं है। ‘महत्वपूर्ण बिंदु’ का मतलब है कि झूठ वही बात हो जो उस प्रयोजन के लिए मायने रखती है जिसके लिए प्रमाणपत्र का उपयोग हो रहा है; तुच्छ या अप्रासंगिक गलती इस पर नहीं आती।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: केवल वही व्यक्ति दंडित किया जा सकता है जिसने झूठा प्रमाणपत्र बनाया हो।

    तथ्य: धारा 198 उस हर व्यक्ति को अलग से दंडित करती है जो उस झूठे प्रमाणपत्र को जानते हुए, उसे असली मानकर उपयोग करता है या करने का प्रयास करता है—भले ही उसने उसे बनाया न हो।

  • मिथक: किसी भी तरह की छोटी‑मोटी गलती या गलत विवरण भी इस धारा के तहत दंडनीय है।

    तथ्य: व्यक्ति को यह पता होना चाहिए कि प्रमाणपत्र झूठा है और उसने उसका उपयोग भ्रष्ट (बेईमानी से) तरीके से किया हो; ईमानदार भूलें या बिना जाने किया गया उपयोग इसके दायरे में नहीं आते।