Indian Penal Code, 1860
धारा 197
repealedIssuing or signing false certificate
Whoever issues or signs any certificate required by law to be given or signed, or relating to any fact of which such certificate is by law admissible in evidence, knowing or believing that such certificate is false in any material point, shall be punished in the same manner as if he gave false evidence.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भारतीय कानून कुछ तथ्यों को केवल आधिकारिक प्रमाणपत्र से सिद्ध करने की अनुमति देता है, बिना इस आवश्यकता के कि गवाह न्यायालय में उपस्थित हो—जैसे चिकित्सा प्रमाणपत्र, विवाह, जन्म या मृत्यु के प्रमाणपत्र, या सरकारी अधिकारियों द्वारा जारी प्रमाणपत्र। क्योंकि न्यायालय और नागरिक इन दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षरकर्ता से जिरह किए बिना भरोसा करते हैं, झूठे तथ्यों का प्रमाणीकरण करने पर कड़ा प्रतिरोधक आवश्यक था। धारा 197, शपथपूर्वक झूठ बोलने (कपट साक्ष्य) की गंभीरता को ऐसे प्रमाणपत्रों तक बढ़ाती है, ताकि जो लोग अपनी प्रमाणित करने की शक्ति का दुरुपयोग करते हैं, वे केवल लिखकर देने के कारण हल्की सज़ा पाकर न बच जाएँ।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने सामान्यतः माना है कि प्रमाणपत्र में असत्य कथन ‘महत्वपूर्ण बिंदु’ से संबंधित होना चाहिए—अर्थात ऐसा तथ्य जो उस उद्देश्य को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त रूप से महत्वपूर्ण हो जिसके लिए प्रमाणपत्र का उपयोग किया जा रहा है, न कि तुच्छ या लिपिकीय त्रुटि। झूठे चिकित्सा प्रमाणपत्रों, चरित्र या शैक्षणिक योग्यता के झूठे प्रमाणपत्रों, और विशेष क़ानूनों के अधीन झूठे प्रमाणपत्रों (जैसे Motor Vehicles Act या Registration कानूनों के अंतर्गत) के मामलों में इस धारा के तहत अभियोजन हुआ है, और अदालतें यह परखती हैं कि प्रमाणित करने वाले को असत्यता का वास्तविक ज्ञान या विश्वास था या नहीं, क्योंकि ईमानदार भूलें इसके दायरे में नहीं आतीं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कहना गलत है कि झूठा प्रमाणपत्र देना, अदालत में झूठ बोलने की तुलना में मामूली अपराध है।
तथ्य: धारा 197 दंड को झूठा साक्ष्य देने के समान बना देती है, क्योंकि प्रमाणपत्रों पर क़ानूनी भरोसा उसी तरह किया जाता है जैसे शपथपूर्वक दिए गए बयान पर।
मिथक: प्रमाणपत्र में किसी भी त्रुटि पर इस धारा के तहत अभियोजन नहीं हो जाता।
तथ्य: असत्य कथन ‘महत्वपूर्ण बिंदु’ पर होना चाहिए और व्यक्ति को उसके असत्य होने का ज्ञान या विश्वास होना चाहिए—ईमानदार भूलें या छोटी-मोटी अशुद्धियाँ इसके अंतर्गत नहीं आतीं।