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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 193

repealed

Punishment for false evidence

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

किसी भी न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता सच्ची गवाही और वास्तविक साक्ष्य पर निर्भर करती है। भारतीय दंड संहिता के रचनाकारों ने परशपथ-भंग (Perjury) के विरुद्ध अंग्रेजी सामान्य विधि परंपराओं से प्रेरणा लेकर, गवाहों, पक्षकारों और अन्य लोगों को झूठ बोलने या साक्ष्य गढ़ने से रोकने के लिए धारा 193 बनाई, क्योंकि झूठी गवाही से निर्दोष का दोषसिद्ध होना या दोषी का छूट जाना like परिणाम दे सकता है और न्यायालयों पर जन-विश्वास को कमजोर करता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि मात्र विरोधाभास या ईमानदार भूल ‘झूठा साक्ष्य’ नहीं बनती—इसके लिए जानबूझकर कही गई असत्य बात आवश्यक है, अर्थात व्यक्ति को वक्तव्य के असत्य होने का ज्ञान था या वह उसे सत्य नहीं मानता था। न्यायालयों ने यह भी माना है कि केवल इसलिए दोषसिद्धि नहीं हो सकती कि बाद में उसका कथन अविश्वसनीय पाया गया या किसी अन्य गवाह के बयान से भिन्न निकला; सुनियोजित असत्यता सिद्ध होनी चाहिए, जिसका आकलन प्रायः निष्पक्ष विचारण या जांच के बाद किया जाता है (उदाहरणतः परशपथ-भंग अभियोजन शुरू करने हेतु दंड प्रक्रिया संहिता की धाराएं 340-344 के अंतर्गत कार्यवाही)।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: इस धारा के तहत किसी गवाह की कोई भी भूल या विरोधाभास ‘झूठा साक्ष्य’ माना जाता है।

    तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि केवल जानबूझकर और समझ-बूझकर कही गई असत्य बातें ही अपराध हैं—ईमानदार भूल, स्मृति-दोष, या भिन्न स्मरण धारा 193 के तहत दंडनीय नहीं हैं।

  • मिथक: यह धारा केवल चल रहे मुकदमों में गवाहों पर ही लागू होती है।

    तथ्य: यह उन मामलों को भी समेटती है जहाँ न्यायिक कार्यवाही के किसी भी चरण में उपयोग हेतु साक्ष्य गढ़ा गया हो, और यह न्यायालय के बाहर दी गई झूठी गवाही (जैसे अन्य विधिक जांचों में) पर भी, कम दंड के साथ, लागू होती है।