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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 186

repealed

Obstructing public servant in discharge of public functions

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन 1860 में तैयार भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) में इस धारा को इसलिए शामिल किया गया कि सरकारी अधिकारी—जैसे राजस्व वसूलना, शांति-व्यवस्था बनाए रखना, या विनियम लागू करना—जनता द्वारा शारीरिक या जानबूझी बाधा के बिना अपने कर्तव्य कर सकें। इसका उद्देश्य प्रशासनिक मशीनरी के सुचारु कामकाज की रक्षा करना था, न कि अधिकारियों को वैध आलोचना या शांतिपूर्ण असहयोग से बचाव देना।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने सामान्यतः माना है कि बाधा ‘स्वैच्छिक’ होनी चाहिए—अर्थात जानबूझकर और इरादतन—और केवल असहयोग, चुप्पी, या निष्क्रिय रूप से मना करना (जैसे दरवाज़ा न खोलना) तब तक बाधा नहीं माना जाता जब तक सक्रिय शारीरिक या बलपूर्वक हस्तक्षेप न हो। न्यायालयों ने यह भी रेखांकित किया है कि बाधा के समय लोक सेवक विधिसम्मत आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा हो; यदि अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर कार्य कर रहा था, तो यह धारा लागू नहीं हो सकती।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: सिर्फ़ बहस करना या किसी सरकारी अधिकारी की आलोचना करना भी इस धारा के अंतर्गत बाधा माना जाता है।

    तथ्य: इस धारा के लागू होने के लिए न्यायालयों ने आमतौर पर सक्रिय और इरादतन हस्तक्षेप (जैसे शारीरिक रूप से रास्ता रोकना) को आवश्यक माना है; मात्र मौखिक असहमति या शांतिपूर्ण विरोध सामान्यतः पर्याप्त नहीं होता।

  • मिथक: यह धारा तब भी लागू होती है जब अधिकारी अपने वैधानिक अधिकार से आगे बढ़कर कार्य कर रहा हो।

    तथ्य: न्यायालयों ने इस धारा का यह अर्थ लगाया है कि बाधा के समय लोक सेवक अपने वैध आधिकारिक कर्तव्यों के विधिसम्मत निर्वहन में लगा होना चाहिए।