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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 187

repealed

Omission to assist public servant when bound by law to give assistance

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

औपनिवेशिक काल के विधायकों ने माना कि लोक सेवकों—जैसे पुलिस, दंडाधिकारी, राजस्व अधिकारी—को क़ानून का प्रवर्तन करने में, खासकर दंगा या गिरफ्तारी जैसी आपात स्थितियों में, आम नागरिकों के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। कई अन्य क़ानून (जैसे Code of Criminal Procedure) नागरिकों पर यह विशिष्ट दायित्व डालते हैं कि बुलाए जाने पर वे अधिकारियों की सहायता करें। धारा 187 ऐसे दायित्वों के जानबूझकर उल्लंघन पर आपराधिक दंड लगाकर इस सहायता‑कर्तव्य को दृढ़ बनाती है, ताकि सहायता का कानूनी दायित्व केवल नैतिक परामर्श न रह जाए बल्कि विशेषकर जन‑शांति की आपात परिस्थितियों में लागू कराने योग्य कर्तव्य बने।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा यह नहीं कहती कि आपको हर समय किसी भी पुलिस अधिकारी की किसी भी बात में हर हाल में मदद करनी होगी।

    तथ्य: यह केवल तब लागू होती है जब किसी अन्य क़ानून ने पहले से ही उस खास परिस्थिति में आपकी सहायता को कानूनी कर्तव्य बना दिया हो—बिना कानूनी आधार वाले मनमाने अनुरोधों पर नहीं।

  • मिथक: अनमनेपन, भूलवश, या अक्षमता के कारण सहायता न कर पाना भी इस धारा के तहत अपराध है।

    तथ्य: इस धारा के लिए जानबूझकर किया गया न करना (इंटेन्शनल ओमिशन) आवश्यक है—आकस्मिक चूक या वस्तुतः असंभव सहायता न दे पाना इसके अंतर्गत नहीं आता।