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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 180

repealed

Refusing to sign statement

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 172-190 के उस समूह का हिस्सा है जो लोक न्याय के विरुद्ध अपराधों और लोक सेवकों के कार्य में बाधा से संबंधित है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जांच या न्यायिक कार्यवाही के दौरान पुलिस, मजिस्ट्रेट या अन्य अधिकारी द्वारा लिखित कथनों पर उन्हें देने वाले व्यक्ति के हस्ताक्षर हों, ताकि अभिलेख भरोसेमंद रहें और बाद में उनसे मुकरा न जा सके। विधिपूर्वक दिए गए कथन पर हस्ताक्षर से इनकार करना जांच या विधिक प्रक्रिया में व्यवधान डाल सकता है, इसलिए कानून ने एक हल्का निवारक प्रावधान रखा है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने इस धारा की व्याख्या सामान्यतः संकीर्ण रूप में और अन्य प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों के साथ मिलाकर की है, जैसे संविधान के अनुच्छेद 20(3) के अंतर्गत आत्मदोषारोपण के विरुद्ध सुरक्षा के कारण अभियुक्त को ऐसे कथनों पर हस्ताक्षर कराने के प्रति सावधानी। न्यायिक दृष्टि यह रेखांकित करती है कि हस्ताक्षर मांगने वाले लोक सेवक के पास विशेष वैधानिक अधिकार होना चाहिए; ऐसा अधिकार न होने पर हस्ताक्षर से इनकार करने पर यह धारा लागू नहीं होती। धारा 180 के पृथक रूप से विश्लेषण पर कोई उल्लेखनीय सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय नहीं है, क्योंकि यह शायद ही कभी प्रयुक्त होती है और प्रायः धाराओं 179 व 181 के साथ देखी जाती है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: आपको हर वह दस्तावेज़ जिस पर पुलिस अधिकारी हस्ताक्षर करवाए, चाहे वह आपका कथन न हो, अनिवार्य रूप से हस्ताक्षर करना होता है।

    तथ्य: यह कानून केवल उसी कथन पर लागू होता है जो आपने स्वयं दिया हो; किसी और द्वारा लिखे गए अन्य दस्तावेज़ों या इक़रारनामों पर यह लागू नहीं होता।

  • मिथक: हस्ताक्षर से इनकार करने पर हमेशा जेल होती है।

    तथ्य: सज़ा न्यायालय के विवेकाधीन होती है और केवल जुर्माने तक सीमित भी हो सकती है; अदालतें इनकार के कारण तथा यह कि लोक सेवक के पास हस्ताक्षर मांगने का वैधानिक अधिकार था या नहीं—इन बातों पर विचार करती हैं।