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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 181

repealed

False statement on oath or affirmation to public servant or person authorized to administer an oath or affirmation

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह उपबंध दंड संहिता (IPC) की उन धाराओं (धारा 177–182) के समूह का भाग है जो लोक सेवकों तथा न्याय प्रशासन से संबंधित अपराधों पर केंद्रित हैं। यह सुनिश्चित करता है कि जब क़ानून किसी व्यक्ति से सत्य बोलने की शपथ या प्रतिज्ञान लेने की मांग करता है—जैसे मजिस्ट्रेट के समक्ष, शपथपत्र (एफ़िडेविट) में, या किसी आधिकारिक जांच के दौरान—तो वह वचन विधिक रूप से प्रवर्तनीय हो। ऐसे प्रावधान के बिना, लोक सेवकों के समक्ष ली गई शपथों के उल्लंघन पर कोई वास्तविक परिणाम न होता और आधिकारिक कार्यवाहियों की निष्पक्षता प्रभावित होती।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि धारा 181 विशेष रूप से उन बयानों पर लागू होती है जो किसी लोक सेवक या अधिकृत व्यक्ति के समक्ष विधि द्वारा बाध्यकारी शपथ या प्रतिज्ञान के तहत दिए गए हों—यह धारा 193 (न्यायिक कार्यवाही में मिथ्या साक्ष्य) से भिन्न है। न्यायालयों ने जोर दिया है कि अभियोजन को यह सिद्ध करना होता है कि कथन असत्य था और अभियुक्त यह जानता या मानता था कि वह असत्य है, या उसे सत्य नहीं मानता था; मात्र अशुद्धि या ईमानदार भूल से दायित्व उत्पन्न नहीं होता। यह प्रावधान शपथ के तहत सरकारी प्राधिकारियों को दिए गए झूठे शपथपत्रों या घोषणाओं वाले मामलों में लागू किया गया है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा केवल अदालत में झूठ बोलने पर लागू होती है।

    तथ्य: यह इससे व्यापक रूप से लागू होती है—किसी भी ऐसे झूठे कथन पर जो किसी लोक सेवक या अधिकृत व्यक्ति के समक्ष विधि द्वारा बाध्यकारी शपथ या प्रतिज्ञान के तहत दिया गया हो; केवल न्यायिक कार्यवाहियां अलग से धारा 193 के अंतर्गत आती हैं।

  • मिथक: ईमानदार भूल या गलत अनुमान भी अपराध माना जाएगा।

    तथ्य: व्यक्ति को यह जानना या मानना चाहिए कि उसका कथन असत्य है, या वह उसे सत्य नहीं मानता हो—सद्भावपूर्वक की गई वास्तविक भूलें इस धारा के दायरे में नहीं आतीं।