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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 179

repealed

Refusing to answer public servant authorized to question

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारतीय दंड संहिता की उन धाराओं (धारा 172–190) के समूह का भाग है जो लोक न्याय के विरुद्ध अपराधों और लोक सेवकों के कार्य में बाधा से संबंधित हैं। इसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि जब कानून किसी व्यक्ति को किसी प्राधिकरण के समक्ष सत्य बोलने के लिए बाध्य करता है (उदाहरणार्थ, गवाह-परीक्षण या वैधानिक जांच में), तो वह केवल चुप रहकर जांच या कार्यवाही को विफल न कर सके। यह राज्य की जानकारी-आवश्यकता और इस शर्त के बीच संतुलन बनाता है कि उत्तर देने का दायित्व पहले से कानून में होना चाहिए और लोक सेवक अपने वैध अधिकार-क्षेत्र में कार्य कर रहा हो।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने सामान्यतः धारा 179 लागू होने से पहले दो पूर्वशर्तों पर बल दिया है: पहली, अभियुक्त उस विषय पर सत्य बताने के लिए किसी विशिष्ट कानूनी दायित्व के अधीन हो (ऐसा दायित्व किसी अन्य कानून, जैसे दंड प्रक्रिया संहिता या किसी विशेष अधिनियम से उत्पन्न हो); और दूसरी, प्रश्न पूछते समय लोक सेवक अपने वैध अधिकार-क्षेत्र में कार्य कर रहा हो। न्यायालयों ने कहा है कि केवल सामान्य सहयोग-कर्तव्य पर्याप्त नहीं है — सत्य उत्तर देने का दायित्व किसी विशिष्ट विधिक प्रावधान से निरूप्य होना चाहिए, और वैध सीमा से बाहर पूछे गए प्रश्नों का उत्तर न देना इस धारा के दायरे में नहीं आता।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा तब लागू होती है जब भी कोई लोक सेवक कोई भी प्रश्न पूछे।

    तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि यह तभी लागू होती है जब व्यक्ति पहले से किसी विशिष्ट कानूनी कर्तव्य के अधीन सत्य बताने को बाध्य हो, और लोक सेवक उस विषय पर अपने वैध अधिकार-क्षेत्र में कार्य कर रहा हो।

  • मिथक: चुप रहना हमेशा सुरक्षित कानूनी विकल्प है।

    तथ्य: यदि कोई व्यक्ति उत्तर देने के लिए कानूनन बाध्य है (जैसे तलब किया गया गवाह), तो मात्र चुप रहना भी इस धारा के अंतर्गत दंडनीय हो सकता है।