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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 173

repealed

Preventing service of summons or other proceeding, or preventing publication thereof

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

अदालतें और सरकारी कार्यालय तभी सुचारु रूप से चल पाते हैं जब उनके आधिकारिक संप्रेषण—समन, नोटिस, आदेश और सार्वजनिक घोषणाएँ—संबंधित व्यक्तियों या आम जनता तक वास्तव में पहुँचें। इतिहास में, अदालत के दूत को रोकना या विधिवत चस्पा नोटिस को फाड़ देना, न्याय को विफल करने या वैधानिक प्रक्रिया से बच निकलने का तरीका रहा है। धारा 173 को इसीलिए बनाया गया कि क़ानून-प्रवर्तन और न्यायिक प्रक्रिया की मशीनरी की रक्षा हो, और इन आधिकारिक संप्रेषणों में जानबूझकर दखल को अपराध ठहराकर यह सुनिश्चित किया जाए कि केवल कागज़ात या घोषणाएँ अपने लक्ष्य तक न पहुँचने देने से कानूनी कार्यवाही नाकाम न हो सके।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा केवल अदालत के समनों पर लागू नहीं है।

    तथ्य: यह उन नोटिसों, आदेशों और सार्वजनिक घोषणाओं पर भी लागू होती है जिन्हें किसी विधिसम्मत रूप से सक्षम लोक सेवक ने जारी किया हो—सिर्फ़ अदालतें ही नहीं।

  • मिथक: सिर्फ़ भूलवश खो देना या अनजाने में नोटिस गुम हो जाना दंडनीय नहीं है।

    तथ्य: इस धारा में ‘जानबूझकर’ रोकथाम की शर्त है—दुर्घटनावश या अनजाने में नोटिस न पहुँच पाना या चस्पा न होना इसके दायरे में नहीं आता।