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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 171C

repealed

Undue influence at elections

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव इस बात पर निर्भर करते हैं कि मतदाता और उम्मीदवार बिना दबाव के कार्य कर सकें। 1860 में निर्मित भारतीय दंड संहिता, जिसे बाद में चुनावी कानून सुधारों ने आकार दिया, ने इस अपराध को इसलिए गढ़ा कि दंगई, प्रभावशाली लोग या धार्मिक प्राधिकारी धमकियों या दैवी दंड के भय दिखाकर लोगों को किसी खास तरह वोट डालने (या न डालने) के लिए मजबूर न कर सकें। यह मतपत्र की पवित्रता की रक्षा करता है—मतदाता या उम्मीदवार की स्वतंत्र इच्छा के साथ छेड़छाड़ पर दंड लगाकर—और साथ ही वैध राजनीतिक प्रचार और विधिसम्मत कार्रवाइयों की सावधानी से रक्षा करता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने, जिनमें भ्रष्ट चुनाव-प्रथाओं की व्याख्या वाले मामलों में सर्वोच्च न्यायालय भी शामिल है, माना है कि ‘अतिरेक प्रभाव’ (undue influence) के लिए स्वतंत्र पसंद में हस्तक्षेप की नीयत का प्रमाण आवश्यक है—सिर्फ मनाना, घर-घर संपर्क करना, या नीतिगत कार्यवाही के वादे (जैसे चुने जाने पर बेहतर सड़कों का वादा) अतिरेक प्रभाव नहीं हैं। न्यायालयों ने वैध प्रचार-अपीलों को दबंग धमकियों या धार्मिक भय उत्पन्न करने से अलग ठहराया है, यह रेखांकित करते हुए कि अभियुक्त की नीयत और पीड़ित की स्वेच्छा का क्षरण दोष सिद्ध करने के केंद्र में है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: किसी को किसी विशेष तरीके से वोट देने के लिए मनाने का कोई भी प्रयास इस धारा के तहत अवैध है।

    तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि सामान्य चुनाव प्रचार, जननीति के वादे, या विधिसम्मत मनाना ‘अतिरेक प्रभाव’ (undue influence) नहीं हैं—केवल वे धमकियाँ या ज़बरदस्ती जो किसी की स्वतंत्र इच्छा छीन लेती हैं, उसी दायरे में आती हैं।

  • मिथक: यह धारा केवल मतदाताओं पर लागू होती है।

    तथ्य: यह मतदाताओं और उम्मीदवारों—दोनों—को उन धमकियों या ज़बरदस्ती से बचाती है जिनका उद्देश्य उनके चुनावी विकल्पों या कार्रवाइयों को नियंत्रित करना हो।