Indian Penal Code, 1860
धारा 169
repealedPublic servant unlawfully buying or bidding for property
Whoever, being a public servant, and being legally bound as such public servant, not to purchase or bid for certain property, purchases or bids for that property, either in his own name or in the name of another, or jointly, or in shares with others, shall be punished with simple imprisonment for a term which may extend to two years, or with fine, or with both; and the property, if purchased, shall be confiscated.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
औपनिवेशिक दौर में प्रशासक अक्सर संपत्ति की बिक्री की निगरानी करते थे — बकाया भू-राजस्व की वसूली, द दिवाला, या न्यायालय के डिक्री के तहत। यदि वही अधिकारी जो ऐसी बिक्री करा रहा है, गुप्त रूप से खुद (या किसी परोक्ष व्यक्ति के जरिए) वह संपत्ति खरीद सके, तो वह कीमत से छेड़छाड़ कर सकता है, अन्य बोलियों को हतोत्साहित कर सकता है, या अंदरूनी जानकारी का दुरुपयोग कर सकता है। धारा 169 इसी हित-संघर्ष की खिड़की बंद करने और आधिकारिक बिक्री/नीलामी में जनविश्वास बनाए रखने के लिए बनाई गई थी।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने सामान्यतः इस धारा को संकीर्ण और तकनीकी रूप से पढ़ा है: अभियोजन को दिखाना होता है (1) अभियुक्त लोक सेवक था, (2) किसी ठोस कानूनी नियम/कर्तव्य ने उस सेवक को प्रश्नगत विशेष संपत्ति को खरीदने या उस पर बोली लगाने से रोका था, और (3) उस सेवक ने इसके बावजूद सीधे या बेनामीदार (नाम उधार देने वाला) के माध्यम से, या साझेदारी में, उसे खरीदा या उस पर बोली लगाई। निर्णयों ने रेखांकित किया है कि महज़ नैतिक कर्तव्य पर्याप्त नहीं है — एक ठोस कानूनी निषेध होना चाहिए (जो सेवा नियमों, विधि, या पद की शर्तों से उत्पन्न हो) और वह उसी संपत्ति या बिक्री के संदर्भ में विशिष्ट हो।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: धारा 169 किसी भी लोक सेवक को सेवा में रहते हुए संपत्ति खरीदने पर दंडित करती है।
तथ्य: यह तभी लागू होती है जब लोक सेवक पर उसी विशेष संपत्ति को खरीदने या उस पर बोली लगाने से संबंधित कोई ठोस कानूनी निषेध हो — जैसे वही अधिकारी उसकी बिक्री या नीलामी करा रहा हो — न कि सामान्य रूप से संपत्ति-खरीद पर।
मिथक: किसी रिश्तेदार या मित्र के नाम से संपत्ति खरीद लेने से दायित्व से बचाव हो जाता है।
तथ्य: यह धारा स्पष्ट रूप से किसी अन्य के नाम, संयुक्त रूप से, या हिस्सेदारी में की गई खरीद को भी समाहित करती है, इसलिए परोक्ष व्यक्ति का सहारा लेने से अपराध से बचाव नहीं होता।