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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 170

repealed

Personating a public servant

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान 1860 के मूल Indian Penal Code का भाग था, जिसका उद्देश्य लोक पदों की निष्कलंकता और शासकीय पदाधिकारियों में जन-विश्वास की रक्षा करना था। औपनिवेशिक प्रशासन को आशंका थी कि अधिकारी होने का ढोंग करने वाले लोग (जैसे कर वसूलने वाले, पुलिस कर्मी या दंडाधिकारी) नागरिकों को धोखा देकर धन वसूल सकते हैं या अधिकार का दुरुपयोग कर सकते हैं। केवल झूठा दावा नहीं, बल्कि उस झूठे दावे के आड़ में किया गया कार्य भी अपराध ठहराकर, यह कानून डींग मारने भर पर नहीं, बल्कि प्रतिरूपण से होने वाली वास्तविक हानि पर प्रहार करता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने सामान्यतः यह माना है कि केवल किसी पद का झूठा दावा पर्याप्त नहीं; अपराध तभी पूर्ण होता है जब व्यक्ति उस पद की ‘आड़ में’ कोई कार्य करता है या करने का प्रयास करता है। न्यायालयों ने इस धारा को धारा 419 (प्रतिरूपण द्वारा धोखाधड़ी) से अलग बताते हुए कहा है कि धारा 170 विशेष रूप से लोक सेवक के आधिकारिक चरित्र का प्रतिरूपण कर उस मानी गई सत्ता का उपयोग करने पर केंद्रित है, जबकि धोखाधड़ी में छल के कारण होने वाले अनुचित लाभ या हानि का प्रमाण अपेक्षित होता है। निर्णयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रतिरूपण करने वाले को व्यक्तिगत लाभ होना आवश्यक नहीं; कार्य करने का प्रयास भी पर्याप्त है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: सिर्फ अपने को लोक सेवक बताना, चाहे मज़ाक में ही क्यों न हो, इस धारा के तहत अपराध है।

    तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि अपराध के लिए सिर्फ झूठा दावा पर्याप्त नहीं; उस झूठी आधिकारिक स्थिति का इस्तेमाल करते हुए कोई कार्य करना या उसका प्रयास करना भी आवश्यक है।

  • मिथक: यह धारा और धोखाधड़ी (धारा 419 IPC) एक ही बात हैं।

    तथ्य: धारा 170 विशेष रूप से लोक सेवक के आधिकारिक चरित्र का प्रतिरूपण करने और उस मानी हुई सत्ता का उपयोग करने को निशाना बनाती है, जबकि धारा 419 के अंतर्गत धोखाधड़ी में छल से अनुचित लाभ या हानि सिद्ध करना आवश्यक होता है—दोनों में कुछ समानता हो सकती है, पर वे विधिक रूप से भिन्न हैं।