Indian Penal Code, 1860
धारा 168
repealedPublic servant unlawfully engaging in trade
Whoever, being a public servant, and being legally bound as such public servant not to engages in trade, engages in trade, shall be punished with simple imprisonment for a term which may extend to one year, or with fine, or with both.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
औपनिवेशिक काल के प्रशासक चाहते थे कि सरकारी अधिकारी अपने पद, प्रभाव या कार्य-समय का उपयोग निजी धंधे चलाने में न करें, क्योंकि इससे हित-संघर्ष, भ्रष्टाचार या कर्तव्य की उपेक्षा हो सकती है। अनेक सेवा नियम (जैसे सिविल सेवकों के आचरण नियम) अलग से सरकारी कर्मचारियों को व्यापार करने से रोकते हैं; धारा 168 ऐसे निषेधों को आपराधिक दंड से समर्थित करती है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों का सामान्य मत रहा है कि यह अपराध तभी लागू होता है जब उस विशेष लोक सेवक पर व्यापार न करने का कोई विशिष्ट विधिक निषेध (जैसे आचरण नियम या क़ानून) लागू हो — अपराध सिद्ध करने के लिए ऐसे बाध्यकारी निषेध का अस्तित्व और उसका उल्लंघन साबित करना पड़ता है। केवल लोक सेवक द्वारा व्यापार में भाग लेना, बिना किसी स्थापित विधिक रोक के, इस धारा को आकर्षित नहीं करता। इस प्रावधान के तहत अभियोजन अपेक्षाकृत दुर्लभ होने और सामान्यतः विशिष्ट सेवा-नियम उल्लंघनों से जुड़े होने के कारण कोई एकल व्यापक रूप से प्रसिद्ध नजीरी मामला उभरकर नहीं आया है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: कोई भी सरकारी कर्मचारी यदि ज़रा-सा भी साइड व्यवसाय करता है तो वह इस धारा के तहत स्वतः अपराध करता है।
तथ्य: यह धारा तभी लागू होती है जब उस लोक सेवक पर व्यापार न करने का कोई विशिष्ट, बाध्यकारी विधिक नियम लागू हो; ऐसे नियम के बिना यह विशेष अपराध लागू नहीं होता।
मिथक: यह धारा उन निजी नागरिकों को कवर करती है जो अवैध व्यापार करते हैं।
तथ्य: यह धारा केवल लोक सेवकों — सरकारी कर्मचारी या अधिकारी — पर लागू होती है, सामान्य निजी नागरिकों पर नहीं।