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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 167

repealed

Public servant framing an incorrect document with intent to cause injury

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

औपनिवेशिक काल के प्रशासन में न्यायालयों, राजस्व अभिलेखों और जन-व्यवहार के लिए सरकारी लिपिकों व अधिकारियों द्वारा तैयार किए गए आधिकारिक दस्तावेज़ों, रजिस्टरों और अनुवादों पर भारी निर्भरता थी। चूँकि नागरिक और न्यायालय इन दस्तावेज़ों की शुद्धता पर भरोसा करते थे, इसलिए कानून का उद्देश्य लोक सेवकों को अपने आधिकारिक दायित्व का दुरुपयोग करके रिकार्ड में जालसाजी करने—निजी लाभ या दूसरों को हानि पहुँचाने—से रोकना था, ताकि सार्वजनिक दस्तावेज़ीकरण की विश्वसनीयता सुरक्षित रहे।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने सामान्यतः माना है कि मात्र त्रुटि या लापरवाही से यह धारा लागू नहीं होती; यह सिद्ध होना चाहिए कि दस्तावेज़ को गलत बनाने का ज्ञान या विश्वास था, साथ ही ऐसी नीयत या जागरूकता थी कि उससे हानि हो सकती है। अभियोजन को यह भी सिद्ध करना होता है कि दस्तावेज़ को तैयार/अनुवाद करना अधिकारी का आधिकारिक दायित्व था और गलत बनाना जानबूझकर या जानते हुए किया गया, ताकि वास्तविक भूल और जानबूझकर की गई कदाचार में भेद किया जा सके।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: किसी सरकारी लिपिक द्वारा किए गए हर प्रकार के दस्तावेज़ी गलती पर इस धारा के तहत दंड मिलता है।

    तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि ईमानदार भूलें या हानि पहुँचाने के इरादे के बिना की गई लापरवाही पर यह धारा लागू नहीं होती; इसके लिए जानबूझकर या जानते हुए की गई जालसाजी आवश्यक है।

  • मिथक: यह धारा किसी भी ऐसे दस्तावेज़ पर लागू होती है जो किसी लोक सेवक द्वारा बनाया गया हो।

    तथ्य: यह तभी लागू होती है जब लोक सेवक को उसी विशिष्ट दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख को तैयार करने या अनुवाद करने का आधिकारिक दायित्व सौंपा गया हो।