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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 166B

repealed

Punishment for non treatment of victim

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह धारा 2013 में, 2012 दिल्ली गैंग-रेप मामले (निर्भया मामला) के बाद, भारतीय दंड संहिता (IPC) में जोड़ी गई। उस घटना ने उजागर किया कि यौन हिंसा और अम्ल हमले के पीड़ितों को कभी-कभी प्रक्रियात्मक या आर्थिक अड़चनों की वजह से अस्पतालों से लौटा दिया जाता था या तत्काल उपचार में देरी की जाती थी। संसद ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 357C जोड़कर हर अस्पताल पर ऐसे पीड़ितों को निःशुल्क प्राथमिक उपचार/चिकित्सा देने का दायित्व डाला, और इसे IPC की धारा 166B के साथ जोड़ा ताकि अस्पताल के प्रभारी द्वारा अनुपालन न करने को अपराध बनाकर उस दायित्व को प्रभावी बनाया जा सके।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

धारा 166B की स्वतंत्र रूप से व्याख्या करने वाला कोई व्यापक रूप से चर्चित सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फ़ैसला विशेष रूप से नहीं है, परन्तु अदालतों ने अम्ल-हमला और बलात्कार पीड़ितों से जुड़े मामलों में बार-बार यह रेखांकित किया है कि CrPC की धारा 357C, IPC की धारा 166B के साथ पढ़ी जाने पर, अस्पतालों पर तत्काल निःशुल्क उपचार देने का बाध्यकारी कानूनी दायित्व बनाती है, और अस्पताल कर्मियों व पुलिस में कड़ाई से पालन तथा जागरूकता के निर्देश दिए हैं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह नियम केवल सरकारी अस्पतालों पर ही लागू होता है।

    तथ्य: क़ानून निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम्स पर भी समान रूप से लागू होता है, न कि केवल केंद्र या राज्य सरकार अथवा स्थानीय निकायों द्वारा चलाए जाने वाले अस्पतालों पर।

  • मिथक: अस्पताल ऐसे पीड़ितों का उपचार करने से पहले भुगतान या पुलिस के कागज़ात माँग सकते हैं।

    तथ्य: CrPC की धारा 357C के तहत, पुलिस की औपचारिकताओं या भुगतान की प्रतीक्षा किए बिना तुरंत और निःशुल्क उपचार देना अनिवार्य है।