Indian Penal Code, 1860
धारा 166
repealedPublic servant disobeying law, with intent to cause injury to any person
Whoever, being a public servant, knowingly disobeys any direction of the law as to the way in which he is to conduct himself as such public servant, intending to cause, or knowing it to be likely that he will, by such disobedience, cause injury to any person, shall be punished with simple imprisonment for a term which may extend to one year, or with fine, or with both.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह उपबंध 1860 में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन थॉमस मैकॉले की प्रारूप समिति द्वारा तैयार भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) के मूल पाठ का हिस्सा था। यह आईपीसी के ‘लोक सेवक’ अध्याय की व्यापक चिंता को दर्शाता है: अधिकारी नागरिकों पर अधिकार रखते हैं, और उस अधिकार का प्रयोग विधि के अनुसार होना चाहिए, न कि लोगों को हानि पहुँचाने के लिए उसका दुरुपयोग। यह धारा उन परिस्थितियों को लक्षित करती है जहाँ अधिकारी सही कानूनी प्रक्रिया जानता है, पर जान-बूझकर उससे विचलित होता है, और या तो चोट (इंजरी) पहुँचाना चाहता है या जानता है कि चोट की संभावना है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने माना है कि मात्र किसी नियम का उल्लंघन पर्याप्त नहीं है; ‘जानते-बूझते’ उल्लंघन के साथ या तो चोट पहुँचाने का आशय होना चाहिए या यह ज्ञान कि चोट होने की संभावना है। भारतीय न्यायालय सामान्यतः यह स्पष्ट प्रमाण चाहते हैं कि कौन-सा विशिष्ट कानूनी निर्देश तोड़ा गया और मानसिक तत्व (मेंस रिया [mens rea]) क्या था, जिसके कारण इस धारा के तहत दोषसिद्धियाँ संबंधित अपराधों की तुलना में अपेक्षाकृत कम रही हैं। अदालतों ने इस प्रावधान को धारा 21 (लोक सेवक की परिभाषा) तथा विभागीय/अनुशासनात्मक कार्यवाहियों से भी अलग माना है, यह कहते हुए कि धारा 166 के अंतर्गत आपराधिक दायित्व ईमानदार भूल या bona fide निर्णय-त्रुटि मात्र से उत्पन्न नहीं होता।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: कोई भी गलती या देरी करने भर से सरकारी अधिकारी पर इस धारा के तहत अपराध सिद्ध हो जाता है।
तथ्य: अदालतें यह प्रमाण मांगती हैं कि अधिकारी ने किसी विशिष्ट कानूनी निर्देश की जानते-बूझते अवज्ञा की और या तो नुकसान पहुँचाने का इरादा रखा या उसे नुकसान की संभावना का ज्ञान था — केवल ईमानदार भूल या मात्र लापरवाही पर्याप्त नहीं है।
मिथक: यह धारा सभी प्रकार के आधिकारिक कदाचार पर लागू होती है।
तथ्य: यह विशेष रूप से लोक सेवक के रूप में आचरण से संबंधित किसी कानूनी निर्देश की अवज्ञा को निशाना बनाती है; सामान्य भ्रष्टाचार या सत्ता के दुरुपयोग पर नहीं, जिनका निवारण अन्य विधियों, जैसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act), से होता है।