Indian Penal Code, 1860
धारा 165
repealedRep. by the Prevention of Corruption Act, 1988
Repealed by the Prevention of Corruption Act, 1988 (49 of 1988), S. 31.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
मूल रूप से, भारतीय दंड संहिता की धारा 165 में लोक सेवक द्वारा अपने द्वारा देखे जा रहे कार्यवाही या कारोबार से जुड़े व्यक्ति से बिना मूल्य चुकाए कोई कीमती वस्तु स्वीकार करना अपराध माना गया था। जैसे-जैसे भारत का भ्रष्टाचार-निरोधी ढांचा अधिक विस्तृत हुआ, विधायकों ने निर्णय लिया कि भ्रष्टाचार-संबंधी सभी अपराधों को एक केंद्रित विधि में समेकित किया जाए। इसी उद्देश्य से निवारण भ्रष्टाचार अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act, 1988) बनाया गया, जिसने लोक सेवकों द्वारा रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार को समग्र रूप से कवर किया, तथा दोहराव से बचने और प्रवर्तन, दंड एवं प्रक्रियाओं का आधुनिकीकरण करने के लिए धारा 165 जैसी ओवरलैपिंग आईपीसी धाराओं को निरस्त कर दिया।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: क्योंकि आईपीसी की धारा 165 निरस्त हो चुकी है, इसलिए अब लोक सेवकों के लिए अपने आधिकारिक कार्य से जुड़े लोगों से उपहार लेना वैध है।
तथ्य: यह आचरण अब भी अवैध है—इसे निवारण भ्रष्टाचार अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act, 1988) के तहत कवर किया गया है, जिसने इस धारा का स्थान लेकर अधिक विस्तृत और अद्यतन प्रावधान प्रदान किए हैं।