Indian Penal Code, 1860
धारा 161
repealedRep. by the Prevention of Corruption Act, 1988
Repealed by the Prevention of Corruption Act, 1988 (49 of 1988), S. 31.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
धारा 161 के तहत मूल रूप से यह अपराध था कि कोई लोक सेवक किसी सरकारी कार्य को करने (या न करने) के बदले धन या अन्य लाभ स्वीकार करे। भ्रष्टाचार-निरोध के भारत के दृष्टिकोण के विकसित होने पर, संसद ने रिश्वत और भ्रष्टाचार से जुड़े सभी अपराधों को भारतीय दंड संहिता में बिखरे रहने के बजाय एक केंद्रित विधि — भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 — में समेटने का निर्णय लिया। इसलिए धारा 161 को, 162–165 जैसी संबंधित धाराओं के साथ, निरस्त कर दिया गया और उसका विषय-वस्तु नए अधिनियम में पुनर्नियोजित कर दी गई।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
निरसन से पहले, धारा 161 की बार‑बार व्याख्या हुई, खासकर इस बात पर कि ‘तुष्टिकरण’ (gratification) और ‘आधिकारिक कार्य’ क्या हैं। न्यायालयों ने माना कि वास्तविक प्राप्ति के बिना केवल रिश्वत की मांग करना या लेने का प्रयास करना भी दायित्व उत्पन्न कर सकता है, और तुष्टिकरण का सख्ती से मौद्रिक होना आवश्यक नहीं। 1988 के अधिनियम के लागू होने के बाद भी, न्यायालयों ने सामान्यतः पुरानी धारा 161 के वादविवादों को नए कानून के समानार्थी प्रावधानों की व्याख्या में प्रासंगिक माना है, क्योंकि मूल अवधारणाएँ वहीं से आगे बढ़ाई गईं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कथन गलत है: आज के रिश्वतखोरी मामलों में IPC की धारा 161 लागू नहीं होती।
तथ्य: इसे 1988 में निरस्त कर दिया गया; लोक सेवकों द्वारा रिश्वतखोरी अब भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत देखी जाती है।
मिथक: निरसन का मतलब यह नहीं कि रिश्वतखोरी वैध हो गई।
तथ्य: रिश्वतखोरी अब भी एक गंभीर अपराध है — बस उसकी परिभाषा IPC से हटकर एक समर्पित भ्रष्टाचार‑रोधी अधिनियम में स्थानांतरित हो गई है।