Skip to content
सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 162

repealed

Rep. by the Prevention of Corruption Act, 1988

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

1988 से पहले भारतीय दंड संहिता की कई धाराएँ (जैसे 161, 162, 163, 164, 165) लोक सेवकों द्वारा रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार से संबंधित थीं। प्रवर्तन को अधिक प्रभावी और व्यापक बनाने के लिए संसद ने भ्रष्टाचार-विरोधी कानूनों को एक समर्पित अधिनियम में समेकित और आधुनिक किया—भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988। इसी सुधार के हिस्से के रूप में, धारा 162 सहित पुरानी, एक-दूसरे से ओवरलैप करती आईपीसी धाराएँ निरस्त कर दी गईं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: धारा 162 आईपीसी आज भी एक दंडनीय अपराध को परिभाषित करती है।

    तथ्य: इसे 1988 में निरस्त कर दिया गया; अब इससे संबंधित कोई भी अपराध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 द्वारा शासित है।

  • मिथक: निरस्त धाराओं का अर्थ है कि जिन कृत्यों को वे कवर करती थीं, वे अब वैध हो गए हैं।

    तथ्य: वह आचरण (लोक सेवकों को रिश्वत देना/लेना) अब भी अवैध है—बस इसे एक अलग, नए कानून के तहत अभियोजित किया जाता है।