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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 152

repealed

Assaulting or obstructing public servant when suppressing riot, etc.

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान 1860 के भारतीय दंड संहिता के मूल पाठ का हिस्सा था, जिसे ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन द्वारा भारत में व्यापक अशांति और दंगों का सामना करने के बाद तैयार किया गया था। विधि‑निर्माताओं का उद्देश्य उन पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को कानूनी संरक्षण देना था जो भीड़, अवैध जमाव या हिंसक भीड़ की स्थितियों को नियंत्रित करने हेतु शारीरिक रूप से हस्तक्षेप करते हैं, क्योंकि ऐसे क्षण खतरनाक होते हैं और शांति बहाल करते समय अधिकारियों को बिना हमले या बाधा के अपना अधिकार प्रयोग करने की आवश्यकता होती है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा केवल बहुत बड़े पैमाने के दंगों और अनेक चोटों की स्थिति में ही लागू होती है।

    तथ्य: यह किसी भी अवैध जमाव, दंगा, या मारपीट (सार्वजनिक स्थान पर लोगों के बीच होने वाली लड़ाई) पर लागू होती है—छोटी गड़बड़ियां भी शामिल हैं, बशर्ते सार्वजनिक सेवक वास्तव में उसे तितर‑बितर करने या दबाने का प्रयास कर रहा हो।

  • मिथक: केवल अधिकारी को शारीरिक रूप से मारना ही उल्लंघन माना जाएगा।

    तथ्य: कानून धमकी देकर आक्रमण करना, बाधा डालना, बाधा डालने का प्रयास करना, या आपराधिक बल का प्रयोग करने की धमकी/प्रयास को भी कवर करता है—वास्तविक शारीरिक संपर्क होना आवश्यक नहीं है।