Indian Penal Code, 1860
धारा 151
repealedKnowingly joining or continuing in assembly of five or more persons after it has been commanded to disperse
Whoever knowingly joins or continues in any assembly of five or more persons likely to cause a disturbance of the public peace, after such assembly has been lawfully commanded to disperse, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to six months, or with fine, or with both.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान औपनिवेशिक दौर के भारतीय दंड संहिता से आया है, जिसे अधिकारियों को अवैध जमावड़ों को दंगे या हिंसा में बदलने से रोकने का साधन देने के लिए तैयार किया गया था। यह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 (जिससे मजिस्ट्रेटों को तितर-बितर होने का आदेश देने की शक्ति मिलती है) के साथ मिलकर काम करता है, और वैध तितर-बितर आदेश की अवहेलना को अपराध बनाकर, बिना कठोर दंगा-सम्बंधी धाराओं के सहारे भी सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने का उद्देश्य रखता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने सामान्यतः माना है कि इस धारा के तहत दोषसिद्धि के लिए अभियोजन को सिद्ध करना होता है कि तितर-बितर होने का आदेश विधिवत दिया गया था (आम तौर पर सक्षम मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी द्वारा) और अभियुक्त ने उस आदेश के बावजूद जानबूझकर सभा में बना रहना जारी रखा। केवल उपस्थित होना, जबकि तितर-बितर होने के आदेश की जानकारी न हो, या स्वयं आदेश ही अवैध/अशुद्ध हो—ऐसी स्थितियों को विभिन्न उच्च न्यायालयों ने दोषसिद्धि के लिए अपर्याप्त माना है, यद्यपि कोई एकल मील का पत्थर जैसा सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय इस धारा का सर्वांगीण प्रतिपादन नहीं करता।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: सिर्फ बड़ी भीड़ का हिस्सा होना ही इस कानून के तहत अवैध है।
तथ्य: यह कानून तभी लागू होता है जब सभा से सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका हो और वैध तितर-बितर होने का आदेश दिया गया हो तथा उसे जानते-बूझते नजरअंदाज किया गया हो।
मिथक: यह धारा प्रदर्शनकारियों को केवल विरोध करने भर के लिए दंडित करती है।
तथ्य: अदालतों ने स्पष्ट किया है कि शांतिपूर्ण सभा और विरोध संरक्षित हैं; यह धारा केवल वैध तितर-बितर आदेश के बाद भी जानबूझकर वहीं बने रहने को लक्षित करती है, न कि स्वयं इकट्ठा होने की क्रिया को।