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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 153

repealed

Wantonly giving provocation with intent to cause riot

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह धारा मूल भारतीय दंड संहिता 1860 का भाग थी, जिसे ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन तैयार किया गया था, जब सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना प्रमुख चिंता थी, विशेषकर साम्प्रदायिक, जातिगत या राजनीतिक तनावों के बीच। इस कानून का उद्देश्य केवल दंगा करने वालों को नहीं, बल्कि उन लोगों को भी दंडित करना है जो जानबूझकर या लापरवाही से अवैध कृत्यों द्वारा दूसरों को हिंसा के लिए उकसाते हैं — यह मानते हुए कि उकसाने वाले स्वयं दंगाइयों जितने खतरनाक हो सकते हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों का सामान्य मत रहा है कि मात्र शब्दों या वैध आचरण से, भले वे उकसाऊ हों, यह धारा लागू नहीं होती — उकसावा ऐसा अवैध कृत्य होना चाहिए जो दुर्भावना से या लापरवाहीपूर्वक किया गया हो। न्यायालयों ने यह भी रेखांकित किया है कि अभियोजन पक्ष को उस आशय या ज्ञान को सिद्ध करना होगा कि वह कृत्य दंगा करवा सकता था, जिससे इस अपराध को संबंधित धाराओं (147–151 IPC) के अंतर्गत साधारण दंगा या अवैध जमावड़े के अपराधों से अलग किया जा सके।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: केवल वे ही लोग दंडित हो सकते हैं जो वास्तव में दंगे में भाग लेते हैं।

    तथ्य: यह धारा उन व्यक्तियों को निशाना बनाती है जो दूसरों को दंगा करने के लिए उकसाते हैं, चाहे वे स्वयं दंगे में शामिल न हों।

  • मिथक: कोई भी आपत्तिजनक कथन या वैध विरोध इस धारा को लागू करा सकता है।

    तथ्य: न्यायालय यह अपेक्षा करते हैं कि उकसावा किसी ऐसे अवैध कृत्य से उत्पन्न हो जो दुर्भावनापूर्वक या लापरवाही से किया गया हो — वैध या केवल आपत्तिजनक आचरण इस प्रावधान के तहत नहीं आता।