Indian Penal Code, 1860
धारा 136
repealedHarbouring deserter
Whoever, except as hereinafter excepted, knowing or having reason to believe that an officer, soldier, sailor or airman, in the Army, Navy or Air Force of the Government of India, has deserted, harbours such officer, soldier, sailor or airman, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to two years, or with fine or with both.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
औपनिवेशिक दौर के सैन्य क़ानून को नागरिकों द्वारा भगोड़ों को बचाने से रोकने का उपाय चाहिए था, क्योंकि भगोड़ा होना सेना के अनुशासन और बल-शक्ति को कमजोर करता है। ब्रिटिश भारतीय सरकार ने यही चिंता भारतीय दंड संहिता 1860 में शामिल की, और जान-बूझकर किसी भगोड़े सैनिक, नाविक या वायुसेनिक को आश्रय देना केवल सैन्य नहीं, बल्कि एक आपराधिक अपराध भी बना दिया। इससे सैन्य अदालतों के साथ-साथ सामान्य आपराधिक अदालतें भी उन लोगों के विरुद्ध कार्यवाही कर सकीं जो भगोड़ों को अधिकारियों से छिपने में मदद करते थे।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: आपको तभी दंडित किया जा सकता है जब आप 100% निश्चित हों कि वह व्यक्ति भगोड़ा था।
तथ्य: क़ानून तब भी लागू होता है जब आपको ‘विश्वास करने का कारण’ था कि भगोड़ा होना हुआ है, भले ही पूर्ण निश्चय न हो—अदालतें देखती हैं कि एक सामान्य समझ वाला व्यक्ति ऐसे हालात में संदेह करता या नहीं।
मिथक: यह धारा किसी भी कारण से किसी सैनिक को ड्यूटी से बचने में मदद करने को कवर करती है।
तथ्य: यह विशेष रूप से उस व्यक्ति को पनाह देने को निशाना बनाती है जो भगोड़ा हो चुका है, न कि अन्य सैन्य उल्लंघनों को जैसे थोड़े समय के लिए बिना अनुमति अनुपस्थित रहना (जिसे सैन्य क़ानून में अलग ढंग से निपटाया जाता है)।