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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 132

repealed

Abetment of mutiny, if mutiny is committed in consequence thereof

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान 1860 के मूल भारतीय दंड संहिता का हिस्सा था, जो 1857 के विद्रोह के बाद तैयार हुई, जब औपनिवेशिक शासन सशस्त्र बलों में कड़ी अनुशासन और निष्ठा बनाए रखने को लेकर अत्यंत चिंतित था। राज्य प्राधिकार के लिए म्यूटिनी को सबसे गंभीर खतरों में माना गया, क्योंकि सेना के भीतर बगावत पूरे शासन को अस्थिर कर सकती थी। यह क़ानून केवल बगावत करने वालों को नहीं, बल्कि उन्हें भड़काने या सहायता देने वालों को भी लक्षित करता है, यह मानते हुए कि उत्साहवर्धन या सुविधा उपलब्ध कराना स्वयं कृत्य जितना ही ख़तरनाक हो सकता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: आपको इस क़ानून के तहत तभी दंड मिलेगा जब आप स्वयं सैनिक हों और म्यूटिनी करें।

    तथ्य: वास्तव में यह धारा म्यूटिनी को उकसाने/प्रेरित करने वाले व्यक्ति—चाहे वह नागरिक ही क्यों न हो और खुद म्यूटिनी में शामिल न हुआ हो—को दंडित करती है।

  • मिथक: सिर्फ़ म्यूटिनी के लिए उकसाना ही इस कड़ी सज़ा को लागू करने के लिए काफ़ी है।

    तथ्य: उकसावे के परिणामस्वरूप म्यूटिनी का वास्तव में होना आवश्यक है; यदि म्यूटिनी घटित ही न हो, तो यह विशेष धारा (अपनी कठोर सजाओं सहित) लागू नहीं होती, यद्यपि उकसावे से संबंधित अन्य प्रावधान फिर भी प्रासंगिक हो सकते हैं।