Indian Penal Code, 1860
धारा 128
repealedPublic servant voluntarily allowing prisoner of state or war to escape
Whoever, being a public servant and having the custody of any State prisoner or prisoner of war, voluntarily allows such prisoner to escape from any place in which such prisoner is confined, shall be punished with imprisonment for life, or imprisonment of either description for a term which may extend to ten years, and shall also be liable to fine.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
औपनिवेशिक काल के भारत में राज्य-बंधियों (राजनैतिक या सुरक्षा कारणों से निरुद्ध व्यक्तियों) और युद्धबंदियों को कड़ी निगरानी में रखना आवश्यक माना गया, क्योंकि उनका भाग जाना जन-व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा बन सकता था। दंड संहिता (IPC) के कैदियों के फरार होने से संबंधित अध्याय का यह प्रावधान लापरवाह या भ्रष्ट कारागार अधिकारियों व कर्मियों को दृढ़ता से उत्तरदायी ठहराने के लिए बनाया गया था, ताकि जिन पर अभिरक्षा का भरोसा किया गया है, वे ऐसे महत्वपूर्ण बंदियों की जान-बूझकर मदद कर फरारी न कराएँ।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह धारा किसी भी लोक सेवक पर लागू होती है जो किसी भी साधारण अपराधी को भाग जाने देता है।
तथ्य: यह धारा विशेष रूप से केवल ‘राज्य-बंधियों’ और ‘युद्धबंदियों’ को कवर करती है; साधारण अपराध-संदिग्धों या दोषसिद्ध कैदियों पर अन्य IPC धाराएँ लागू होती हैं।
मिथक: किसी पहरेदार को दंडित किया जा सकता है भले ही फरारी आकस्मिक हो या मात्र लापरवाही के कारण हुई हो।
तथ्य: यह धारा मांग करती है कि लोक सेवक ने ‘स्वेच्छा से’ फरारी होने दी हो, अर्थात जान-बूझकर या इरादतन सहूलियत देना—सिर्फ़ लापरवाही भर नहीं।