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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 111

repealed

Liability of abettor when one act abetted and different act done

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारतीय दंड संहिता 1860 के मूल निर्माताओं से आता है, जिन्होंने चाहा था कि अभिप्रेरण का कानून वास्तविक परिस्थितियों को कवर करे जहाँ दिए गए निर्देश योजना के अनुसार पूरी तरह न हों। परिणाम योजना से थोड़ा भिन्न होने के कारण अभिप्रेरक को जवाबदेही से बचने देने के बजाय, कानून उस वास्तविक कृत्य तक उत्तरदायित्व बढ़ाता है, बशर्ते वह अभिप्रेरण से प्रवाहित (उद्भूत) हो।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने प्रायः धारा 111 को उससे संबंधित उपबंधों के साथ पढ़ा है (जो इस पाठ में सम्मिलित नहीं हैं), जो उत्तरदायित्व को उन कृत्यों तक सीमित करते हैं जो अभिप्रेरण का ‘संभावित परिणाम’ हों। न्यायालयों ने माना है कि जो कृत्य योजना से बिल्कुल असंबद्ध हो उसके लिए अभिप्रेरक पर दोष नहीं लगाया जा सकता; पर यदि किया गया भिन्न कृत्य अभिप्रेरित कृत्य से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हो या उसके पूर्वानुमेय विस्तार के रूप में उभरे, तो उत्तरदायित्व लगेगा। यह समूह-अपराधों के मामलों में लागू किया गया है जहाँ मूल योजना से पीड़ित या तरीका भिन्न रहा।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: अभिप्रेरक केवल उसी बात के लिए उत्तरदायी होता है जो उसने शब्दशः मांगी हो।

    तथ्य: न्यायालय इस धारा को (संबंधित उपबंधों के साथ) इस अर्थ में पढ़ते हैं कि यदि किया गया भिन्न कृत्य अभिप्रेरित कृत्य से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हो या उसका संभावित परिणाम हो, तो अभिप्रेरक उसी किए गए कृत्य के लिए उत्तरदायी है।

  • मिथक: इस धारा का मतलब है कि दूसरा व्यक्ति चाहे जितना असंबद्ध काम कर दे, अभिप्रेरक उस सबके लिए भी उत्तरदायी होगा।

    तथ्य: (सरलीकृत) संबंधित उपबंध और न्यायनिर्णय यह सीमा तय करते हैं कि उत्तरदायित्व उन्हीं कृत्यों तक है जो अभिप्रेरण का संभावित परिणाम हों; योजना से पूर्णतः असंबद्ध और आकस्मिक कृत्य इसके दायरे में नहीं आते।