Indian Penal Code, 1860
धारा 110
repealedPunishment of abetment if person abetted does act with different intention from that of abettor
Whoever abets the commission of an offence shall, if the person abetted does the act with a different intention or knowledge from that of the abettor, be punished with the punishment provided for the offence which would have been committed if the act had been done with the intention or knowledge of the abettor and with no other.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में उकसावे (धारा 107-120) की विस्तृत योजना का हिस्सा है, जो उन स्थितियों से सम्बद्ध है जहाँ कोई व्यक्ति किसी दूसरे को अपराध करने के लिए उकसाता है, साज़िश करता है, या जानबूझकर सहायता देता है। कभी-कभी जो व्यक्ति वास्तविक कृत्य करता है उसकी मानसिक स्थिति (मंशा या ज्ञान) उकसाने वाले से भिन्न हो सकती है। धारा 110 यह सुनिश्चित करती है कि उकसाने वाले की दायित्व-निरूपण उसकी अपनी मानसिक अवस्था के आधार पर हो, ताकि वह केवल इस कारण न बच निकले या अलग दंड न पाए कि वास्तविक कर्ता ने अलग मानसिकता से काम किया। यह सिद्धान्त दर्शाता है कि उकसावे के लिए आपराधिक उत्तरदायित्व उकसाने वाले के ही दोषी मन से संचालित होना चाहिए।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: उकसाने वाले को उस कृत्यकर्ता ने वास्तव में जो किया उसके आधार पर दंडित किया जाता है।
तथ्य: धारा 110 स्पष्ट करती है कि उकसाने वाले को उसके द्वारा उकसावे के समय रही अपनी मंशा या ज्ञान के आधार पर दंडित किया जाएगा, भले ही वास्तविक कर्ता ने भिन्न (अक्सर अधिक गम्भीर) मंशा या ज्ञान के साथ कार्य किया हो।
मिथक: यदि वास्तविक कृत्य योजना से अधिक बुरा निकल आए, तो उकसाने वाले को भी स्वतः ही अधिक कड़ा दंड मिल जाता है।
तथ्य: उकसाने वाले का दंड सख्ती से उसकी अपनी मंशा या ज्ञान से जुड़ा है, न कि उस अधिक गम्भीर परिणाम से जो कर्ता ने उत्पन्न कर दिया हो।