Indian Penal Code, 1860
धारा 109
repealedPunishment of abetment if the act abetted is committed in consequence and where no express provision is made for its punishment
Whoever abets any offence shall, if the act abetted is committed in consequence of the abetment, and no express provision is made by this Code for the punishment of such abetment, be punished with the punishment provided for the offence.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
IPC में अभिभवन (उकसाना, षड्यंत्र करना, या जानबूझकर सहायता देना) स्वयं में दंडनीय कृत्य है, पर अभिभवन कई रूपों में हो सकता है। धाराएँ 107–108 अभिभवन की परिभाषा देती हैं, और कई विशिष्ट धाराएँ (जैसे आत्महत्या के अभिभवन या कुछ नामित अपराधों के अभिभवन) पहले से ही अलग-अलग दंड तय करती हैं। धारा 109 एक सामान्य ‘डिफ़ॉल्ट’/‘अवशिष्ट’ नियम की तरह काम करती है: जब अभिभवन के परिणामस्वरूप मुख्य अपराध वास्तव में हो जाता है और उस अभिभवन के लिए कोई विशेष दंड-विधान मौजूद नहीं है, तो क़ानून मुख्य अपराध के लिए निर्धारित दंड को ही ‘उधार’ ले लेता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि जो व्यक्ति सफलतापूर्वक अपराध कराने वाला है, वह केवल इसलिए दंड से न बच जाए कि संहिता किसी खास तरह के अभिभवन के लिए अलग धारा लिखना भूल गई।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालय लगातार मानते आए हैं कि धारा 109 स्वयं कोई स्वतंत्र अपराध सृजित नहीं करती—यह तभी लागू होती है जब इसे मूल अपराध और अभिभवन संबंधी धाराओं (धारा 107–108) के साथ पढ़ा जाए। न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि धारा 109 के अंतर्गत दोषसिद्धि के लिए यह सिद्ध होना चाहिए कि अभिभूत कृत्य वास्तव में किया गया था, और अभिभवनकर्ता का उकसावा, षड्यंत्र या सहायता उसका वास्तविक कारण था। निर्णयों ने ‘उकसाकर अभिभवन’, ‘षड्यंत्र द्वारा अभिभवन’ और ‘सहायता द्वारा अभिभवन’ में भेद बताया है, यह रेखांकित करते हुए कि मात्र उपस्थिति या केवल जानकारी, बिना किसी सकारात्मक कृत्य के, सामान्यतः अभिभवन नहीं ठहरती। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी विशेष धारा में किसी खास अपराध के अभिभवन का दंड पहले से निर्धारित है, तो धारा 109 लागू नहीं होती, क्योंकि यह तभी संचालित होती है जब कोई स्पष्ट प्रावधान न हो।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: धारा 109 एक नया, अलग अपराध ‘अभिभवन’ पैदा करती है।
तथ्य: यह अपने-आप कोई अपराध नहीं बनाती—यह केवल दंड बताती है, और वह भी मुख्य अपराध के लिए तय दंड को ‘उधार’ लेकर, तथा केवल तब जब IPC में उस विशेष अभिभवन को पहले से किसी अन्य धारा में अलग से कवर न किया गया हो।
मिथक: आपको धारा 109 के तहत तब भी दंडित किया जा सकता है जब अभिभूत कृत्य कभी घटित ही न हुआ हो।
तथ्य: धारा 109 के लिए आवश्यक है कि अभिभूत अपराध वास्तव में अभिभवन के ‘परिणामस्वरूप’ हुआ हो; जो कृत्य घटित ही नहीं होता उसके अभिभवन का प्रावधान अलग धाराओं, जैसे धारा 116 या 117, में किया गया है।