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सं Samvidhan

Criminal justice & police powers

Selvi v. State of Karnataka

Supreme Court of India · 2010 · (2010) 7 SCC 263

सत्यापन प्रतीक्षित

न्यायालय ने निर्णय दिया कि पुलिस किसी संदिग्ध को सूचना निकालने के लिए नार्को-परीक्षण, झूठ पकड़ने वाला परीक्षण (लाई डिटेक्टर टेस्ट) या मस्तिष्क स्कैन कराने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। ऐसे आक्रामक तरीकों का उपयोग तभी किया जा सकता है जब व्यक्ति स्वेच्छा से सहमति दे और यह समझे कि इसमें क्या-क्या शामिल है। इस निर्णय ने आपराधिक जाँच के दौरान व्यक्तियों को उनकी इच्छा के विरुद्ध उनके मन की जाँच-पड़ताल से संरक्षण प्रदान किया।

कहानी

तथ्य

कर्नाटक और अन्य स्थानों में पुलिस जाँच के दौरान अभियुक्त व्यक्तियों पर उनकी इच्छा के विरुद्ध नार्को-विश्लेषण, पॉलीग्राफ परीक्षण और ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफ़ाइल (BEAP) परीक्षण के उपयोग से संबंधित कई आपराधिक अपीलों को एक साथ सूचीबद्ध किया गया। अभियुक्तों ने इन तकनीकों को बलपूर्वक और असंवैधानिक बताकर चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि ये उनकी इच्छा के विरुद्ध सूचना उजागर करने के लिए उन्हें विवश करती हैं। राज्य ने इस प्रथा का बचाव जटिल आपराधिक मामलों में सत्य का अनावरण करने हेतु एक वैध अन्वेषण साधन के रूप में किया।

न्यायालय के समक्ष प्रश्न

क्या अभियुक्त को उसकी सहमति के बिना नार्कोविश्लेषण, पॉलिग्राफ तथा बीईएपी (Brain Electrical Activation Profile) परीक्षणों के अधीन करना संविधान के अनुच्छेद 20(3) के अंतर्गत आत्म-अभियोग के विरुद्ध संरक्षण के अधिकार तथा अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है?

न्यायिक निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नार्कोविश्लेषण, पॉलीग्राफ और बीईएपी (Brain Electrical Activation Profile) परीक्षणों का अनैच्छिक प्रशासन ‘साक्ष्यात्मक दवाब’ (testimonial compulsion) के समान है और अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन करता है, तथा सहमति के बिना मानसिक प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप करके अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गोपनीयता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का भी अतिक्रमण करता है। ऐसे परीक्षण केवल विषय (व्यक्ति) की स्वतंत्र, सूचित और स्वैच्छिक सहमति के साथ ही, प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा उपायों का पालन करते हुए—जिनमें वकील तक पहुँच और परीक्षण की रिकॉर्डिंग का विकल्प शामिल है—किए जा सकते हैं। अनैच्छिक परीक्षणों के परिणाम साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं हैं, यद्यपि स्वैच्छिक परीक्षण के परिणामस्वरूप बाद में और स्वतंत्र रूप से खोजी गई जानकारी (भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के अंतर्गत) स्वीकार्य हो सकती है।

यह जिस सिद्धांत का समर्थन करता है

आरोपी पर जबरन नार्कोविश्लेषण, पॉलिग्राफ या मस्तिष्क-मानचित्रण परीक्षण कराना, अनुच्छेद 20(3) के उल्लंघन में निषिद्ध साक्ष्यात्मक अनिवार्यकरण के बराबर है, और साथ ही अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षित मानसिक गोपनीयता तथा व्यक्तिगत स्वायत्तता का भी हनन करता है। ऐसे परीक्षण कराने की शर्त यह है कि सहमति स्वतंत्र रूप से दी गई हो और उसके परिणामों के पूर्ण ज्ञान के साथ दी गई हो; यही इन परीक्षणों के प्रशासन के लिए अनिवार्य पूर्व-आवश्यकता है।

प्रावधान जिनपर इस मामले का प्रभाव पड़ा

सार्वजनिक अभिलेखों से AI-सहायता प्राप्त सारांश। पूर्ण निर्णय पढ़ें: Indian Kanoon.