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सं Samvidhan

Environment & public health

M.C. Mehta v. Union of India (Oleum Gas Leak)

Supreme Court of India · 1987 · 1987 AIR 1086; 1987 SCR (1) 617

सत्यापन प्रतीक्षित

दिल्ली में विषैली गैस रिसाव से लोगों के घायल होने और मृत्यु होने के बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि खतरनाक उद्योग चलाने वाली कंपनियाँ यदि किसी व्यक्ति को हानि पहुँचती है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी उठाएँगी, और मुआवज़ा देने से बचने के लिए कोई कानूनी रास्ता नहीं होगा। इसका अर्थ यह हुआ कि खतरनाक कारखानों के पास रहने वाले सामान्य नागरिकों को अधिक सशक्त कानूनी संरक्षण मिला और औद्योगिक दुर्घटनाओं से हुई चोटों के लिए मुआवज़ा पाने का मार्ग अधिक स्पष्ट हो गया। इस निर्णय ने यह भी पुष्टि की कि जब ऐसे नुकसान से उनके मूल अधिकार, जैसे जीवन का अधिकार, का उल्लंघन हो, तो पीड़ित सीधे सर्वोच्च न्यायालय से मुआवज़े के लिए संपर्क कर सकते हैं।

कहानी

तथ्य

ओलियम गैस दिल्ली में श्रीराम फूड्स ऐंड फर्टिलाइज़र इंडस्ट्रीज़ की एक इकाई से भोपाल गैस त्रासदी के तुरंत बाद लीक हो गई, जिससे एक अधिवक्ता की मृत्यु हो गई और आस-पास के क्षेत्र में कई व्यक्तियों को चोटें आईं। एम. सी. मेहता ने पहले ही एक जनहित याचिका दायर की थी जिसमें इस खतरनाक संयंत्र को बंद करने/स्थानांतरित करने की मांग की गई थी; वह याचिका लंबित रहते ही यह रिसाव हुआ। न्यायालय को अनुच्छेद 32 के अंतर्गत अपने उपचारात्मक (रिमेडियल) अधिकार-क्षेत्र के दायरे और उन उपक्रमों पर लागू दायित्व के मानक का निर्धारण करना था जो खतरनाक या स्वभावतः जोखिमयुक्त उद्योगों में संलग्न हैं।

न्यायालय के समक्ष प्रश्न

यह प्रश्न कि अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय निजी औद्योगिक उपक्रमों द्वारा किए गए मूल अधिकारों के उल्लंघन के लिए क्षतिपूर्ति प्रदान कर सकता है या नहीं, तथा खतरनाक या स्वभावतः जोखिमयुक्त गतिविधियों में संलग्न उपक्रमों पर दायित्व का कौन‑सा मानक लागू होना चाहिए।

न्यायिक निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कोई उपक्रम जो किसी जोखिमपूर्ण या स्वभावतः खतरनाक गतिविधि में संलग्न है, समुदाय के प्रति यह पूर्ण और अविनियोज्य दायित्व रखता है कि किसी प्रकार की हानि न होने पाए; और यदि हानि होती है, तो उस उपक्रम पर सभी प्रभावित व्यक्तियों को क्षतिपूर्ति देने की पूर्ण (निरपेक्ष) देयता होगी, तथा इसके लिए Rylands v. Fletcher में स्वीकृत पारंपरिक नियम जैसी कोई भी अपवाद-श्रेणी लागू नहीं होगी। न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि उसके पास अनुच्छेद 32 के अंतर्गत नये उपचार गढ़ने तथा दायित्व के नये सिद्धांत विकसित करने की शक्ति है, जब प्रचलित विधि मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपर्याप्त पाई जाए; इसमें यह शक्ति भी सम्मिलित है कि मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन की कार्यवाहियों में ही सीधे क्षतिपूर्ति प्रदान की जा सके।

यह जिस सिद्धांत का समर्थन करता है

जहाँ कोई उद्यम एक खतरनाक या स्वाभाविक रूप से जोखिमयुक्त उद्योग में संलग्न होता है जो अपने परिसर के भीतर और आसपास के व्यक्तियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए संभावित खतरा उत्पन्न करता है, वहाँ उस पर समुदाय के प्रति एक निरपेक्ष और अप्रतिहर्त्य दायित्व होता है, और उससे उत्पन्न किसी भी हानि के लिए दायित्व पूर्णतः निरपेक्ष होता है, जो साधारण दायिकी (tort) के सिद्धांतों के अंतर्गत उपलब्ध अपवादों से अप्रभावित रहता है। अनुच्छेद 32 के तहत मूल अधिकारों का संरक्षक होने के नाते सर्वोच्च न्यायालय उन अधिकारों को लागू करने हेतु आधुनिक औद्योगिक समाज के अनुरूप नए प्रतिकार तथा क्षतिपूर्ति के मापदण्ड विकसित कर सकता है।

प्रावधान जिनपर इस मामले का प्रभाव पड़ा

सार्वजनिक अभिलेखों से AI-सहायता प्राप्त सारांश। पूर्ण निर्णय पढ़ें: Indian Kanoon.