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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 98

Evidence as to document unmeaning in reference to existing facts

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

दस्तावेज़ वास्तविक लेन‑देन को प्रतिबिंबित करने के लिए होते हैं, पर लोग कभी‑कभी विवरण में अनिश्चितता रखते हैं या नाम, स्थान या वर्णन में ईमानदार भूल कर देते हैं। यह प्रावधान इसलिए है कि केवल इसलिए कोई दस्तावेज़ खारिज न हो जाए या अर्थहीन न माना जाए कि उसके शाब्दिक शब्द किसी वास्तविक तथ्य से मेल नहीं खाते। इसके बजाय, न्यायालय परिवेशगत प्रमाण (जैसे किसके पास कब्जा है, या अन्य परिस्थितियाँ) का प्रयोग कर यह पहचान सकते हैं कि पक्षकारों की सच्ची मंशा क्या थी, ताकि तकनीकी शब्द‑त्रुटि किसी वास्तविक लेन‑देन को विफल न कर दे।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यदि दस्तावेज़ के शब्द वास्तविकता से मेल नहीं खाते, तो दस्तावेज़ अमान्य या निरर्थक हो जाता है।

    तथ्य: न्यायालय दस्तावेज़ को शून्य मान लेने के बजाय वास्तविक आशय समझने के लिए बाहरी प्रमाण देख सकते हैं।

  • मिथक: यह प्रावधान न्यायालयों को दस्तावेज़ में नए शब्द जोड़ने या उसे फिर से लिखने की शक्ति देता है।

    तथ्य: यह केवल इस सीमा तक अनुमति देता है कि उपलब्ध शब्द वास्तव में किस वस्तु/तथ्य की ओर संकेत करते थे, यह स्पष्ट करने हेतु प्रमाण लिया जाए; समझौते/लेन‑देन की वास्तविक शर्तें बदली नहीं जा सकतीं।